समयसार गाथा-९७ ] [ ८१ अने ‘मारो पति.’ अरे! धूळेय तारुं नथी. बधा ज्यां भिन्न भिन्न छे त्यां एने अने तारे शुं संबंध? जेम एक झाड उपर सांजे पंखी मेळो भराय अने सवार पडतां सौ पोतपोताना मार्गे चाल्या जाय छे तेम एक कुटुंबमां बधां भेगां थई जाय पण वास्तवमां कोई कोईनुं कांई नथी. कयांयथी आव्या अने कयांय पोताना मार्गे जुदा जुदा चाल्या जशे.
अहीं कहे छे के पर्यायमां जे राग थाय ए पण तारी कोई चीज नथी तो मारो पुत्र, मारी पत्नी, मारा पिता-आवी वात तुं कयांथी लाव्यो? आ शुभाशुभ राग ते पुण्य-पाप तत्त्व छे, आस्रव तत्त्व छे अने तुं भगवान ज्ञायक तत्त्व छो. प्रभु! आ रागथी तारे कांई संबंध नथी तो पुत्र, परिवार आदि पर साथे तारे संबंध कयांथी आव्यो? आचार्यदेव कहे छे के-धर्मी जीव उदासीन अवस्थावाळो थयो थको मात्र जाणनार ज छे. बारमी गाथामां कह्युं छे के ते काळे व्यवहारनय जाणेलो प्रयोजनवान छे.
अहाहा...! आ शास्त्रनी रचना तो देखो! आने सिद्धांत कहेवाय. एक ठेकाणे कांईक, बीजे ठेकाणे बीजुं कहे ते सिद्धांत न कहेवाय. बारमी गाथामां कह्युं छे के सम्यग्द्रष्टिने जे राग आवे ते, ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे. परिज्ञायमानस्तदात्वे प्रयोजनवान् एम त्यां टीकामां शब्दो पडेला छे. राग-व्यवहार ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे, परंतु ते आदरणीय नथी. पूर्ण वीतरागता न थाय त्यां सुधी साधकदशामां व्यवहार-राग होय छे खरो, पण ते जाणेलो प्रयोजनवान छे. अहीं पण कह्युं छे के मात्र जाण्या ज करे छे.
पंचास्तिकायमां (गाथा १३६मां) एम कह्युं छे के अस्थाननो तीव्र रागज्वर छोडवा माटे ज्ञानीने शुभराग आवे छे. ज्ञानीने कोई अशुभ राग पण आवे पण ज्ञानी तेने जाणे ज छे, राग मारो छे एम मानतो नथी. अने तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघन थयो थको अत्यंत अकर्ता प्रतिभासे छे. पर्यायनी अहीं वात छे. द्रव्य तो निर्विकल्प विज्ञानघन छे ज. अहाहा...! आवा द्रव्यनी द्रष्टि जेने थई छे ते सम्यग्द्रष्टि रागनो अत्यंत अकर्ता प्रतिभासे छे.
‘जे परद्रव्यना अने परद्रव्यना भावोना र्क्तृत्वने अज्ञान जाणे ते पोते कर्ता शा माटे बने? अज्ञानी रहेवुं होय तो परद्रव्यनो कर्ता बने! माटे ज्ञान थया पछी परद्रव्यनुं कर्तापणुं रहेतुं नथी.’
ज्ञान थया पछी ज्ञानी व्यवहारनो जे राग आवे ते रागनो कर्ता थतो नथी. ज्ञानी