Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

आत्मानो स्वभाव तो त्रणकाळ त्रणलोकने जाणवा-देखवानो छे. भले वर्तमानमां श्रुतज्ञान हो, पण आत्मा राग अने रजकणथी भिन्न बधानो ज्ञाताद्रष्टा छे. अहाहा...! आत्मा पवित्र ज्ञानमय प्रभु चैतन्यप्रकाशस्वरूप त्रिकाळ आनंदस्वरूप छे. तोपण अरेरे! अज्ञानथी आकुलित बनीने अज्ञानी पोतानी मेळे कर्ता थाय छे.

* कळश प८ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘अज्ञानथी शुं शुं नथी थतुं? हरणो झांझवाने जळ जाणी पीवा दोडे छे अने ए रीते खेदखिन्न थाय छे. अंधारामां पडेला दोरडाने सर्प मानीने माणसो डरीने भागे छे. तेवी ज रीते आ आत्मा, पवनथी क्षुब्ध थयेला समुद्रनी माफक, अज्ञानने लीधे अनेक विकल्पो करतो थको क्षुब्ध थाय छे अने ए रीते-जोके परमार्थे ते शुद्धज्ञानघन छे तोपण-अज्ञानथी कर्ता थाय छे.’

अज्ञानथी शुं शुं नथी थतुं? अज्ञानथी अनेक अनर्थ थाय छे. जुओ, सिंहणनुं बच्चुं सिंहणथी नथी डरतुं. तेनी पासे जईने ते धावे छे, केमके खबर छे के ते माता छे. परंतु कुतराथी ते डरे छे केमके अज्ञान छे. तेवी ज रीते पवनथी डोलता दरियानी जेम आत्मा अज्ञानने लीधे अनेक विकल्पो करतो थको क्षुब्ध थाय छे, खळभळी ऊठे छे. प्लेगनो रोग थाय तो बिचारो भयथी खळभळी ऊठे के हवे बे त्रण दिवसमां मोत थशे. अरेरे! अनादि अनंत पोतानी चीजना भान विना आवा अनंत दुःखो जीवे सहन कर्यां, पण हुं आत्मा ज्ञानमय छुं एवो अनुभव न कर्यो! अरे! जगत आखुं मोहनी मायाजाळमां फसाई रह्युं छे! आ जगत तद्न माया (मा या) छे एम नथी. जगत तो जगतमां छे. पण जगत मारामां नथी अने हुं जगतमां नथी. आवुं भेदज्ञान नहि होवाथी परद्रव्य मारुं छे एवी मान्यता वडे जगत मोहपाशमां बंधाई गयुं छे. भाई! वेदांत सर्वथा अद्वैत ब्रह्म माने छे तेवुं वस्तुनुं स्वरूप नथी. बधुं मळीने एक आत्मा छे ए मान्यता यथार्थ नथी.

भगवान आत्मा परमार्थथी विज्ञानघन छे. दश मण बरफनी शीतळ पाट होय छे ने! तेम आत्मा आनंदनी पाट छे. बरफनी पाट तोलदार छे, पण आ आत्मपाट तो अरूपी चैतन्यबिंब छे. अहाहा...! अंतरमां देखो तो आत्मा राग विनानी चीज एकला ज्ञान अने आनंदनुं अरूपी बिंब छे तोपण अज्ञानथी जीव अनेक विकल्पोथी क्षुब्ध थयो थको कर्ता थाय छे. अनादिथी जीव कर्ता थईने दुःखी थाय छे. सम्यग्ज्ञान थाय तो कर्तापणुं मटे छे अने ज्ञातापणे रहे छे. श्लोक प८ पूरो थयो.

* * *

ज्ञानथी आत्मा कर्ता थतो नथी एम हवे कहे छेः-