Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९७ ] [ ८७

लोकोने एकान्त छे, निश्चयाभास छे एवुं बहारथी लागे, पण भाई! आ सम्यक् एकान्त छे. निश्चय साथे व्यवहार हो, पण व्यवहार धर्म नथी. साधकने यथापदवी व्यवहार होय छे, पण ते धर्म नथी एम ते यथार्थ जाणे छे. रात्रिभोजननो धर्मीने त्याग होय छे. जैन नाम धरावनारने पण रात्रिभोजन आदि न होय. रात्रे भोजन करवामां तीव्र लोलुपतानो अने त्रसहिंसानो महादोष आवे छे. माटे जैन नामधारीने पण रातनां खान-पान इत्यादि न होय. केरीनां अथाणां इत्यादि जेमां त्रसजीवोनी उत्पत्ति थई जाय एवो आहार पण जैनने होई न शके. आ बधा व्यवहारना विकल्प हो, पण ए धर्म नथी.

अहीं तो कहे छे के पोताना शुद्ध आनंदना रसने भूली विकल्पना रसमां जे निमग्न छे तेने आकुळताना स्वादनुं वेदन होय छे. बहु सूक्ष्म वात. भाई!

दरेक प्राणी सुखने इच्छे छे पण सुखना कारणने इच्छतो नथी; तथा दुःखने इच्छतो नथी पण दुःखना कारणने छोडतो नथी. आनंदनो नाथ प्रभु आत्मा सुखथी भरेलो छे. त्यां द्रष्टि करतो नथी अने दुःख जेनुं स्वरूप छे एवा व्यवहारना रागमां सुखबुद्धि करे छे. अहा! अज्ञानीनी विचित्र गति छे! पण भाई! रागथी-दुःखथी आत्माना आनंदनी प्राप्ति कदी न थई शके. आत्मानो निर्मळ आनंद तेना अनुभवथी प्राप्त थाय छे. कह्युं छे ने के-

‘‘वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावै विश्राम;
रस स्वादत सुख ऊपजै, अनुभौ याकौ नाम.’’

आत्मा शुद्ध चिदानंदघन वस्तु प्रभु-तेनो विचार करतां ध्याननी धून चढी जाय अने अंदर विश्राम लेतां विकल्पो ठरी जाय, मटी जाय तेने आनंदरसना स्वादथी सुख ऊपजे छे. आनुं नाम अनुभव छे अने एनाथी सुख छे. अरे भाई! तने सत्यनुं शरण लेवुं केम कठण पडे छे? स्वभावना पक्षमां आवी सत्यनी प्रतीति तो कर! शुभभावथी कल्याण थाय एम मानीने तो अनंतकाळ गुमाव्यो छे.

आत्मा शुद्धज्ञानमय वस्तु होवा छतां तेनुं भान नहि होवाथी अज्ञानी विकल्पोना समूहना चक्रावे चढेलो छे. में व्रत कर्यां, तप कर्यां, दया पाळी, भक्ति करी-एम विकल्पोना चक्रावे चढी गयो छे तेथी ते रागनो कर्ता थाय छे जीवननो केटलोक काळ तो स्त्री, कुटुंब, परिवार, धंधापाणी इत्यादि पापमां काढे छे. बाकीना सात-आठ कलाक ऊंघवामां गाळे छे. आ प्रमाणे परमां सुखबुद्धि करीने अज्ञानी रागादिनो कर्ता थाय छे, घडियाळनां कारखानां, लादीनां कारखानां इत्यादि मोटा वेपार-उद्योग चालता होय त्यां अज्ञानी राजीराजी थई जाय छे! अरे भाई! ए बधो अशुभराग तो तीव्र आकुळता छे. त्यां सुख केवुं?