Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प ए तो निमित्तनुं ज्ञान कराववा कह्युं छे. जो आम न माने तो पूर्वापर विरोध थई जाय छे.

आत्मा आनंदरसथी भरेली चीज छे. तेनो अनुभव करवो ते मोक्षमार्ग छे. समयसार नाटकमां आवे छे के-

‘‘अनुभव चिंतामनि रतन, अनुभव है रसकूप;
अनुभव मारग मोखकौ अनुभव मोख सरूप.’’

त्यां एम न कह्युं के व्यवहारनो राग मोक्षमार्ग छे. व्यवहार होय छे, आवे छे; पण एनाथी आत्माना आनंदनो अनुभव थाय छे ए विपरीत मान्यता छे. जीवने व्यवहारना पक्षनुं आ अनादि-शल्य पडयुं छे. अरे! आत्माना आनंदनी अनुभव दशा प्रगट करवामां व्यवहारनी अपेक्षा नथी एवुं जेने श्रद्धान नथी ते व्यवहारने छोडी अनुभव केम प्रगट करी शकशे?

पवनथी तरंगवाळा समुद्रनी माफक, अज्ञानने लीधे आ जीवो विकल्पोना समूहने करे छे. जीव अज्ञानथी शुभाशुभरागना विकल्पनो कर्ता थईने विकल्पो करे छे एम अहीं बताववुं छे. जोके आत्मा शुद्धज्ञानमय छे तोपण आकुळित बनतो थको पोतानी मेळे कर्ता थाय छे.

समयसार कळशटीकामां आ श्लोकना अर्थमां एम कह्युं छे के-‘‘सर्व संसारी मिथ्याद्रष्टि जीव सहजथी शुद्धस्वरूप छे तोपण मिथ्याद्रष्टिने लीधे आकुलित थता थका बळजोरीथी ज कर्ता थाय छे.’’ राग-दया, दान, भक्ति आदिना जे विकल्प ते अंदर वस्तुमां नथी, परंतु पोताना ऊंधा जोरनी बळजोरीथी राग उत्पन्न थाय छे. आत्मा वस्तु तो शुद्ध ज्ञानघन, आनंदघन निर्विकारी प्रभु छे. ते रागनो कर्ता केम थाय? जेम समुद्रमां तरंग ऊठे छे तेम जीव अनेक विकल्प करे छे ते अज्ञाननी बळजोरी छे. अज्ञानना बळथी जीव विकाररूपे परिणमे छे. आत्मा एवो छे नहि, आत्मा तो स्वभावथी शुद्ध चैतन्यघन प्रभु छे. तोपण आत्मद्रष्टि नहि होवाथी आकुलित थतो थको बळजोरीथी ज कर्ता थाय छे. आत्मा ज्ञाननो पिंड प्रभु एकलो जाणग- जाणगस्वभावी छे ते कर्ता केम थाय छे? अनादि अज्ञानने लीधे बळजोरीथी शुभाशुभ रागनो, विकल्पोना समूहनो कर्ता थाय छे. आ में दया पाळी, व्रत कर्यां, भक्ति करी, पूजा करी, मंदिर बांध्युं, ने प्रतिष्ठा करी इत्यादि रागनो मिथ्या श्रद्धाना जोरथी अज्ञानी कर्ता थाय छे.

आत्मानुं स्वरूप तो सहज शुद्धज्ञानमय छे. ते जाणवानुं काम करे के रागनुं अने परनुं काम करे? सर्वज्ञ परमात्मा कहे छे के-अमे सर्वज्ञ थया ते अमारा स्वभावमां सर्वज्ञपणुं हतुं एमां एकाग्र थईने सर्वज्ञ थया छीए; राग अने व्यवहारथी सर्वज्ञ थया नथी.