समयसार गाथा-९७ ] [ ८प स्त्रीमां, मकानमां, पैसामां सुख छे एम भ्रमथी मानी पर वस्तुनी आशाए दोडधाम करी मूके छे. पैसा रळवा माटे कुटुंबने छोडी परदेश जाय, त्यां एकलो रहे. आम अतिशय लोभातुर जेओ पैसा मेळववा बहार दोडी दोडीने जाय छे ते बधा मृगला जेवा छे. कह्युं छे ने के- ‘मनुष्यरुपेण मृगाश्चरन्ति’ मनुष्यना देहमां तेओ मृगनी जेम भटके छे. पोताने भूलीने परमां सुखबुद्धि करे ते हरणिया जेवा ज छे, तेओ संसारमां भटके ज छे.
सुख काजे बहार परदेशमां जाय पण भाई! सुख बहारमां कयांय नथी. कस्तूरी मृगनी नाभिमां कस्तूरी होय छे. पवनना झकोरे सुगंध प्रसरे त्यां सुगंध बहारथी आवे छे तेम ते मृग माने छे. एने खबर नथी के एनी नाभिमां कस्तूरी भरी छे त्यांथी सुगंध आवे छे. तेथी ते जंगलमां दोडादोड करी थाकीने पडे छे अने महा कष्टने प्राप्त थाय छे. तेम आत्माना अंर्तस्वभावमां सुख भर्युं छे. अज्ञानीने एनी खबर नथी तेथी बाह्य अनुकूळ सामग्रीमांथी सुख लेवा तेना भणी दोट मूके छे. पण सुख तो मळतुं नथी, मात्र जन्म-मरणना कष्टने प्राप्त थाय छे. परमां सुख छे एवुं ते माने छे ते अज्ञानना कारणे छे. पोताना सच्चिदानंदस्वरूपने छोडीने, मृगजळ समान रागमां सुखबुद्धि करे छे ते अज्ञानथी छे. आत्मानो अतीन्द्रिय आनंदनो रस अने रागनो दुःखरूप रस ए बेनो भेद न जाणतां रागना रसनो अति कलुषित स्वाद अनादिथी लई रह्यो छे ते अज्ञानना कारणे छे.
वळी, ‘अज्ञानात्’ अज्ञानने लीधे ‘तमसि रज्जौ भुजगाध्यासेन’ अंधकारमां पडेली दोरडीमां सर्पनो अध्यास थवाथी ‘जनाः द्रवन्ति’ लोको भागी जाय छे. जुओ, छे तो दोरडी ज; पण अंधारामां नहि जणावाथी सर्प छे एम भय पामी लोको दूर भागी जाय छे. तेम आत्मा परमानंदमय परम सुखस्वरूप पदार्थ छे. जरा शांत थई स्वसन्मुख थाय तो अतीन्द्रिय आनंद प्राप्त थाय तेम छे. परंतु अनादिथी जे आ विषयसुख छे ते पण कदाच नाश पामशे एवा भयथी अज्ञानने लीधे संसारी जीव पोताना आत्माथी दूर ने दूर भागे छे. रे अज्ञान!
‘च’ अने (तेवी रीते) ‘अज्ञानात्’ अज्ञानने लीधे ‘अमी’ आ जीवो ‘वातोत्तरंङ्गाब्धिवत्’ पवनथी तरंगवाळा समुद्रनी माफक ‘विकल्पचक्रकरणात्’ विकल्पोना समूह करता होवाथी –‘शुद्धज्ञानमयाः अपि’ जोके तेओ शुद्धज्ञानमय छे तोपण-‘आकुलाः’ आकुलित बनता थका ‘स्वयम् कर्त्रीभवन्ति’ पोतानी मेळे कर्ता थाय छे.
विकल्पनो जे कर्ता थाय छे ते अज्ञानथी छे एम अहीं बताववुं छे. लोकोने लागे के व्यवहार विना कोई रस्तो नथी; व्यवहारथी निश्चय थाय. अरे प्रभु! व्यवहार तो राग छे, दुःख छे. ते दुःखथी आत्माना आनंदनो अनुभव केम थाय? शास्त्रमां कह्युं छे