८४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प तेम अज्ञानीने रागनो स्वाद अने पोतानो स्वाद-बे भिन्न छे एम स्वादभेद भासतो नथी. अहा! आवी वीतरागनी वाणी आ काळे दुर्लभ छे. जे वीतरागनी वाणी सांभळवा जातीय वैर भूलीने अति विनयभावथी सिंह, वाघ, बकरां, हाथी, बिलाडी, उंदर आदि प्राणीओ भगवानना समोसरणमां दोडयां आवे छे अने पासे बेसीने खूब जिज्ञासाथी सांभळे छे ते वाणी महा मंगळरूप छे. जेनां भाग्य होय तेना काने पडे एम छे.
अहीं कहे छे के रागनो स्वाद अने पोतानो स्वाद-बन्ने भिन्न छे एम स्वादभेदनुं अज्ञानीने भान नथी तेथी ते शुभाशुभभावना कलुषित स्वादने पोतानो स्वाद माने छे. तेथी ते रागमां एकाकाररूप प्रवर्ते छे. रागथी भिन्न पोते ज्ञातापणे रागनो जाणनार ज छे एवुं अज्ञानी जाणतो नथी एटले रागादि भावमां ते एकाकार थई जाय छे. अज्ञानीने भक्ति आदिनी मुख्यता होय छे तेथी ते भक्ति आदिना रागमां एकाकार थई जाय छे.
ज्ञानीने भक्ति आदिनो राग आवे छे पण ज्ञानी तेमां एकाकार नथी. ज्ञान अने रागना स्वादभेदनो जेने विवेक प्रगट थयो छे ते ज्ञानी स्वावलंबने धर्मने साधे छे. कह्युं छे ने के-
अहीं विवेक एटले भेदज्ञान अर्थ थाय छे. परनी दया पाळवी ए विवेक नथी; पण भगवान आत्मा शुभरागना विकल्पथी भिन्न ज्ञायक चैतन्यमय प्रभु छे एवुं भेदज्ञान करवुं ते विवेक छे. शरीरनी गमे ते अवस्था थाय, बरफनी जेम लोही जामी जाय, श्वास रुंधाई जाय, अंदर मुंझवण थाय, अने देह छूटी जाय एवी अवस्थामां पण ज्ञानी रागादिभाव साथे एकाकार थता नथी. आ विवेक-भेदज्ञान छे!
भगवान आत्मा आनंदरसथी, चैतन्यरसथी भरेलो प्रभु छे. तेने द्रष्टिमां लेतां अंदरथी आनंदनां झरणां झरे एवी पोतानी चीज छे; परंतु श्रद्धा नथी तेथी अज्ञानी जीव स्वपरना भेळसेळ स्वादने पोतानो स्वाद जाणे छे.
अज्ञानथी ज जीवो कर्ता थाय छे एवा अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
‘अज्ञानात्’ अज्ञानने लीधे ‘मृगतृष्णिकां जलधिया’ मृगजळमां जळनी बुद्धि थवाथी ‘मृगाः पातुं धावन्ति’ हरणो तेने पीवा दोडे छे. खारीली जमीनमां सूर्यनां किरण पडे तो जळ जेवुं देखाय छे. मृगला दोडता दोडता जळनी आशाए त्यां जाय अने जईने जुए तो त्यां कांई न होय. जळ कयां हतुं ते मळे? तेम अज्ञानी जीव