अहीं शुद्धनय कतकफळना स्थाने छे. पाणी अने कादवने जेम कतकफळ जुदां करे छे. तेम शुद्धनय अनुसार वस्तु जे त्रिकाळी अखंड एकरूप ज्ञायकभाव छे तेमां द्रष्टि करतां, तेनो अनुभव करतां पर्यायमांथी मलिन पुण्य-पापना भाव जुदा पडी जाय छे. पुण्य-पापना भाव आत्मानी शांति दाझतां थाय छे. पद्मनंदी पंचविंशतिकामां दान अधिकारमां द्रष्टांत आवे छे के तारी शांति दाझीने कषायमंदताना परिणाम थया. एना फळरूपे आ बाह्य सामग्री मळी. तेने जो तुं एकलो भोगवीश अने धर्मप्रभावना अर्थे तेनो उपयोग नहीं करे तो तुं कागडाथी पण जाय तेवो छे. केमके पथ्थरनी कूंडीमां दाझेला उकडीआ नाख्या होय ते कागडो ‘का, का, का’ एम पुकारीने बीजा कागडाओने पण बोलावीने खाय छे, एकलो खातो नथी. अहीं तो एम कहेवुं छे के आवा पुण्य-पापना भावोनो अनुभव ते मिथ्यादर्शन छे अने शुद्धनय वडे ते पुण्य-पापनी मलिनता जुदी पडी जाय छे. तेथी जेओ शुद्धनयनो आश्रय करे छे तेओ ज सम्यक् अवलोकन करता होवाथी सम्यग्द्रष्टि छे, पण बीजा सम्यग्द्रष्टि नथी. शुद्धनयनो आश्रय करे छे एटले के त्रिकाळी अभेद एकरूप ज्ञायकनो जेओ आश्रय करे छे तेओ ज वस्तुना स्वरूपने सम्यक् प्रकारे जुए छे, अनुभवे छे अने तेथी तेओ ज सम्यग्द्रष्टि छे. परंतु बीजा जेओ अशुद्धनयनो सर्वथा आश्रय करे छे तेओ सम्यग्द्रष्टि नथी. जेओ रागनो, भेदनो, एक समयनी पर्यायनो आश्रय करे छे तेओ सम्यग्द्रष्टि नथी एटले मिथ्याद्रष्टि ज छे. माटे कर्मथी भिन्न आत्माना देखनाराओए व्यवहारनय अनुसरवा योग्य नथी. रागथी तथा पर्यायथी पण भिन्न एवो पोतानो ज्ञानानंदमूर्ति भगवान छे एम जेमने द्रष्टि थई छे तेमणे व्यवहारनय अनुसरवा योग्य एटले आश्रय करवा योग्य नथी. रागनुं, भेदनुं के पर्यायनुं यथास्थित ज्ञान भले हो, पण तेनो अनुभव के आश्रय करवा योग्य नथी. * भावार्थ उपरनुं प्रवचन *
अहीं व्यवहारनयने अभूतार्थ अने शुद्धनयने भूतार्थ कह्यो छे. जेनो विषय विद्यमान न होय तेने अभूतार्थ कहे छे. व्यवहारनयने अभूतार्थ कहेवानो आशय एवो छे के-शुद्धनयनो विषय अभेद एकाकाररूप नित्य द्रव्य छे, तेनी द्रष्टिमां भेद देखातो नथी; माटे तेनी द्रष्टिमां भेद अविद्यमान, असत्यार्थ ज कहेवो जोईए. जुओ, शुद्धनयने अहीं भूतार्थ कह्यो छे. अतीन्द्रिय आनंदनो पिंड एवो जे ज्ञायकभाव एने ज सत्य कह्यो छे. पर द्रव्यनी तो अहीं वात नथी. शरीर, मन, वाणी, देव, गुरु, शास्त्र, इत्यादि पर तो परमां रह्या. अहीं तो एक त्रिकाळी द्रव्यस्वभाव अने