बीजो वर्तमान पर्यायभाव एम आत्मामां बे प्रकार छे; तेमां त्रिकाळी द्रव्यस्वभाव सत्य छे अने पर्यायभाव असत्य छे एम कह्युं छे. जेनो विषय हयाती धरावतो न होय ते असत्य छे. व्यवहारनयनो विषय विद्यमान नथी माटे ते असत्य छे, अभूतार्थ छे. अनादिथी आ जीव दुःखना पंथे एटले के रागना अने पर्यायना पंथे दोराई रह्यो छे. अनंतकाळमां ते मोटो शेठ थयो होय, के राजा थयो होय के स्वर्गनो देव थयो होय के दिगंबर द्रव्यलिंगी साधु थयो होय, तेणे त्रिकाळी चीज सत्यार्थ द्रव्यस्वभावनो कदीय स्वीकार कर्यो नथी, अने पर्याय छे, राग छे, भेद छे एम मान्युं छे अर्थात् एनो स्वीकार कर्यो छे. तेने सुखना पंथे चढाववा अहीं कहे छे के त्रिकाळी वस्तु ज्ञायक ते सत्य छे अने पर्याय छे ते असत्य छे. आम कहीने भूतार्थ द्रव्यस्वभावनो आश्रय कराववा मागे छे, केमके भूतार्थ स्वभावनी द्रष्टि थतां संसार रहेतो नथी. व्यवहारनयने अभूतार्थ कहेवानो आशय शुं? तो कहे छे के शुद्धनयनो विषय अभेद एकाकाररूपे नित्य द्रव्य छे, तेनी द्रष्टिमां भेद देखातो नथी. अहाहा-! पंडित जयचंद्रजीए शुं स्पष्टीकरण कर्युं छे! शुद्धनयनुं ध्येय अभेद एकाकार छे. तेनी द्रष्टिमां आ ज्ञान, आनंद इत्यादि गुणो अने आ आत्मा गुणी एवा भेद देखाता नथी. दया, दान, व्रत, तप, पूजा, भक्ति इत्यादि पर्यायना विकल्पो अभेदनी द्रष्टिमां जणाता नथी, बहार ज रही जाय छे. आवो स्वभाव अने स्वभाववान अभेद एकाकार छे, तेनो स्वीकार करी आश्रय करतां सम्यग्दर्शनादि प्रगट थाय छे अने ते धर्म छे. आ सिवाय बीजो कोई मार्ग नथी. भाई! व्रत-तप आदिना विकल्पमां रोकाई अने ते विकल्पनो कर्ता थई तें अनादिथी मिथ्यात्वनुं ज सेवन कर्युं छे. तथा समोसरणमां बिराजमान अरिहंतदेवनी मणि-रत्नथी आरती उतारी, कल्पवृक्षना फूलथी अनंतवार पूजा करी छे, पण सत्यार्थ द्रव्यस्वभावनो स्वीकार कर्यो नहीं तेथी तने अद्यापि सम्यग्दर्शनादि लेश पण धर्म थयो नथी. लोकोए मूळ वात सांभळी नथी तेथी अभूतार्थ एवा व्यवहारमां रोकाई गया छे. अहीं कहे छे त्रिकाळी अभेदनी द्रष्टिमां भेद जणातो नथी, तेथी तेनी द्रष्टिमां भेद अविद्यमान असत्यार्थ ज कहेवो जोईए. हवे कहे छे-एम न समजवुं के भेदरूप कांई वस्तु ज नथी. द्रव्यमां गुण छे ज नहि, पर्याय छे ज नहि, भेद छे ज नहि-एम नथी. आत्मामां अनंत गुणो छे, ते बधा निर्मळ छे. वळी कोई एम माने के एकाकार द्रव्य ज छे अने पर्याय नथी तो एम नथी. द्रष्टिना विषयमां गुणोनो भेद नथी; पण अंदर वस्तुमां अनंतगुणो छे. भेद सर्वथा कांई वस्तु नथी एम मानवामां आवे तो तो जेम वेदांतमतवाळाओ भेदरूप अनित्यने देखी