अवस्तु मायास्वरूप कहे छे अने सर्वव्यापक एक अभेद नित्य शुद्धब्रह्मने वस्तु कहे छे एवुं ठरे अने तेथी सर्वथा एकांत शुद्धनयना पक्षरूप मिथ्याद्रष्टिनो ज प्रसंग आवे.
वेदांतवाळा जेम एक ज आत्मा सर्वव्यापी माने छे-एम आ वात नथी. केटलाकने आ निश्चयनी व्याख्या वेदांत जेवी लागे छे, पण वेदांत पर्यायने कयां माने छे? अनेक गुणो कयां माने छे? अनेक आत्मा कयां माने छे? एनी तो तर्कथी कल्पीने मानी लीधेली वात छे. आ वातने अने वेदांतने कोई मेळ नथी. आ तो सर्वज्ञकथित सूक्ष्म न्याययुक्त वात छे.
भगवान जिनेश्वरदेवे केवळज्ञानथी आत्मा जेवो प्रत्यक्ष जोयो तेवो कह्यो छे. जेना मतमां सर्वज्ञनो स्वीकार नथी तेमां सत्यार्थ वस्तु होई शके नहीं. सर्वज्ञना स्वीकार विना आत्मा सर्वज्ञस्वभाव छे एवी द्रष्टि होती नथी. वस्तुतः आत्मा सर्वज्ञस्वभाव छे तो पर्यायमां सर्वज्ञता प्रगट थाय छे.
आ जैननी मूळवात निश्चयनी ज्यां बहार आवी त्यां लोकोने वेदांत जेवुं लागे छे. क्रियाकांडनी वात आवे तो कहे छे के आ जैननी वात छे. आवुं कहेनारा अने माननारा जैनधर्मना मूळ रहस्यने जाणता ज नथी. अनंत तीर्थंकर परमेश्वरो थई गया. तेओ आ सत्यार्थ वस्तुने अनुभवीने मुक्ति पाम्या छे. अने जगत समक्ष ए ज वात जाहेर करी छे.
पर्याय सम्यग्दर्शननो विषय नथी, परंतु त्रिकाळ ध्रुव ज्ञायकने विषय करनार पर्याय छे. तेने न माने ते सांख्यमती छे. आत्मा शरीर प्रमाण छे, तेने वेदांतमतवाळा (क्षेत्रथी) सर्वव्यापक माने छे. तेओ बधुं मळीने वस्तु एक कहे छे, एक शुद्ध ब्रह्मने ज वस्तु कहे छे, पण वस्तु अनेक छे. वळी वस्तुमां गुणो छे एम मानता नथी. वस्तु सर्वथा नित्य कहे छे, अनित्य पर्यायने मानता नथी. आम सर्वथा पर्याय आदिने मायास्वरूप असत्य कहेतां वेदांतमत थई जाय. तेथी सर्वथा एकांत शुद्धनयना पक्षरूप मिथ्यात्वनो प्रसंग आवे. माटे सर्वथा एकांत न मानवुं. कथंचित् अशुद्धता छे, भेदो छे, पर्याय छे एम अपेक्षाथी बराबर समजवुं.
हवे कहे छे-माटे अहीं एम समजवुं के जिनवाणी स्याद्वादरूप छे, प्रयोजनवश नयने मुख्य-गौण करीने कहे छे. जुओ, शुद्धनयने सत्य कह्यो अने पर्यायने असत्य, अविद्यमान कही ते शा माटे एनो खुलासो करे छे. कहे छे के जिनवाणी स्याद्वादरूप- एटले अपेक्षाथी कथन करनारी छे. जेथी ज्यां जे अपेक्षा होय, त्यां ते समजवी जोईए.