प्रयोजनवश शुद्धनयने मुख्य करी सत्यार्थ कह्यो छे अने व्यवहारने गौण करी असत्य कह्यो छे. त्रिकाळी अभेद शुद्ध द्रव्यनी द्रष्टि करतां जीवने सम्यग्दर्शन थाय छे. आवा प्रयोजनने सिद्ध करवा त्रिकाळी द्रव्यने अभेद कहीने भूतार्थ कह्युं छे. अने पर्यायनुं लक्ष छोडाववा तेने गौण करी असत्यार्थ कही छे. आत्मा अभेद त्रिकाळी ध्रुव छे. तेनी द्रष्टि करतां भेद देखातो नथी. अने भेदद्रष्टिमां निर्विकल्पता थती नथी. माटे प्रयोजनवश भेदने गौण करी असत्यार्थ कहेलो छे. अनंतकाळमां जन्म-मरणनो अंत करवाना बीजरूप सम्यग्दर्शन जीवने थयुं नथी. एवा सम्यग्दर्शननी प्राप्तिनुं अहीं प्रयोजन सिद्ध करवुं छे. तेथी शुद्ध ज्ञायकने मुख्य करी सत्यार्थ कह्यो छे. अने पर्याय तथा भेदने गौण करी व्यवहार कही तेने असत्यार्थ कह्यो छे.
हवे नयने मुख्य-गौण करी कथन करवानुं कारण शुं ते विस्तारथी कहे छे. प्राणीओने भेदरूप व्यवहारनो पक्ष तो अनादि काळथी ज छे, अने एनो उपदेश पण बहुधा सर्व प्राणीओ परस्पर करे छे. जीवने अनादिथी पर्यायबुद्धि चाली आवे छे. अंदर आनंदनो नाथ त्रिकाळी भगवान पोते बिराजे छे तेने द्रष्टिमां कदीय लीधो नथी. अने भेदरूप व्यवहारनो पक्ष, पुण्यनो पक्ष, रागनो पक्ष, पर्यायनो पक्ष तथा वर्तमान मति-श्रुतज्ञाननी पर्यायनो पक्ष प्राणीओने अनादिकाळथी छे.
वळी व्यवहारनो उपदेश पण बहुधा सर्व प्राणीओ परस्पर करे छे. ‘आपणे संसारी छीए, कांई वीतराग तो नथी; वळी व्रत, तप, पूजा, भक्ति, दान इत्यादि व्यवहार धर्म छे, धर्मनां अंग छे. एटले आपणे ते व्यवहारधर्मनुं पालन करवुं जोईए. व्यवहार कांई छोडी देवाय? व्यवहार करतां करतां निश्चयधर्म प्रगटे.’ आम परस्पर मोटा भागना संसारी प्राणीओ रागना पक्षनो उपदेश आपता होय छे.
वळी कोई एम पण कहेता होय छे-‘पर्याय छे, तेनुं ज्ञान करवुं जोईए ने? पर्याय जाणवी जोईए, पर्यायने विषय बनाववो जोईए, अन्यथा एकांत थई जाय. पर्याय पण वस्तु छे, अवस्तु नथी एम शास्त्रमां पण कह्युं छे. कार्य तो पर्यायमां थाय छे ने? पर्याय विना कांई कार्य थाय? आम पर्यायनो पक्ष करी परस्पर व्यवहारना पक्ष रूप उपदेश करीने मिथ्यात्व पुष्ट करी रह्या होय छे.
अहीं बे वात करी. एक तो भेदनो पक्ष, व्यवहारनो पक्ष जीवने अनादिकालीन छे. अने बीजुं व्यवहारनो उपदेश पण प्राणीओ बहुधा परस्पर करे छे. हवे त्रीजी वात करे छे. वळी जिनवाणीमां व्यवहारनो उपदेश शुद्धनयनो हस्तावलंब (सहायक) जाणी बहु कर्यो छे; पण एनुं फळ संसार ज छे. भगवान सर्वज्ञदेवनी वाणीमां व्यवहारनो