Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १४७

उपदेश शुद्धनयनुं निमित्त जाणी घणो कर्यो छे. भाषा जुओ! व्यवहारनो उपदेश घणो कर्यो छे पण एनुं फळ संसार ज छे. जेम दादरो चढनार कठेडो पकडीने उपर चढे छे तेम शुद्धनयने हस्तावलंब जाणी जिनवाणीमां व्यवहारनो उपदेश घणो छे, पण व्यवहारनुं फळ संसार ज छे. त्रिकाळी ज्ञायकनो आश्रय लेवाना काळमां व्यवहार निमित्त होय छे तेथी निमित्तनुं ज्ञान कराववा शास्त्रमां व्यवहारनां घणां कथनो होय छे. जेमके शास्त्रमां आवे छे के प्रचंड कर्मकांडथी ज्ञानकांड थाय छे. त्यां प्रचंडकर्मकांड ए तो शुभराग छे अने एनुं फळ तो बंध छे, संसार छे. परंतु ज्ञानकांड थवाना काळमां ते सहकारी निमित्त छे एम जाणी व्यवहारथी एम कथन करवामां आव्युं छे.

ए प्रमाणे पद्मनंदी पंचविंशतिकामां आवे छे के मुनिवरोने आहारदान आपे तेणे मोक्षमार्ग आप्यो. आहार आपवानो भाव तो शुभराग छे, परंतु मोक्षमार्गमां स्थित मुनिओने शरीरनी स्थितिमां आहार निमित्त देखीने व्यवहारथी आ कथन कर्युं छे. साक्षात् तीर्थंकरदेव छद्मस्थ दशामां होय तेमने आहार आपवानो भाव आवे तेनाथी पुण्य बंधाय, धर्म न थाय, मुक्ति न थाय.

श्रावकोए देवपूजा, गुरुपास्ति इत्यादि प्रतिदिन करवां जोईए तथा दया दान आदि पुण्यकार्य करवां जोईए एवुं पद्मनंदी पंचविंशतिकामां खूब आवे छे. ए तो श्रावकने पोतानी भूमिकामां सहकारी एवा पुण्यना भावो एने आवता होय छे तथा एवा भावो द्वारा ते अशुभनो निषेध करतो होय छे एम जणाववा ए प्रमाणे व्यवहारनो उपदेश छे. बाकी पुण्यनुं पण फळ बंध छे, संसार छे, मोक्ष नथी.

शास्त्रमां एम पण आवे छे के व्यवहार साधक अने निश्चय साध्य छे. आ व्यवहारनयनुं वचन छे. व्यवहार एटले राग साधक अने निश्चिय एटले वस्तु त्रिकाळ साध्य-एम कदी होई शके नहीं. पण आ तो यथार्थ सहकारी निमित्तनां ज्ञान करावनारां व्यवहारनां वचन छे, ते यथार्थ समजवां जोईए. समयसार गाथा सोळमां कह्युं छे के साधु पुरुषे दर्शन, ज्ञान, चारित्र सेववा योग्य छे.’ त्यां पर्यायने सेववानी वात करी छे ए व्यवहारथी उपदेश छे. सेवन तो एक ध्रुव भूतार्थ ज्ञायकनुं ज करवानुं छे, पण लोको समजे एटला माटे भेदथी व्यवहार द्वारा समजाव्युं छे. पण व्यवहार नयनो आश्रय करवा जाय तो तेनुं फळ तो संसार ज छे एम यथार्थ जाणवुं.

हवे कहे छे-शुद्धनयनो पक्ष तो कदी आव्यो नथी अने एनो उपदेश पण विरल छे-कयांक कयांक छे. हुं एक अखंड नित्यानंद ध्रुवस्वरूप भगवान छुं एवो अंतरमां शुद्धनयनो पक्ष कदीय आव्यो नथी. अनंतकाळमां अनंतवार हजारो राणीओ अने राजपाट