Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१४८ [ समयसार प्रवचन

छोडी नग्न दिगंबर मुनि थयो, पण अंतरमां चिदानंद चैतन्यमूर्ति भगवान जे पोते बिराजे छे तेनो पक्ष न लीधो, तेनुं लक्ष करी आश्रय न कर्यो. महाव्रतादि क्रियाकांडना फळमां अनंतवार स्वर्गमां गयो पण आत्मद्रष्टि विना त्यांथी पाछो नरक, तिर्यंच आदि नीची गतिमां गयो. आम अनादिथी जन्म-मरण कर्यां पण तेनो अंत आवे एवुं कांई कर्युं नहीं. धंधो करवो, वेपार करवो, कमावुं, परिवारनुं पालन करवुं, छोकरां परणाववां इत्यादि अनेकरूप पापना-हिंसाना भाव सेवी एना फळमां दुःखी थईने रखडयो ए तो ठीक; पण शुद्धनयना आश्रय विना अनंतवार शुभभाव करी पुण्यबंधन करी चार गतिमां रखडयो छे. अरे! नरक, निगोदनी वेदनानी शी वात? पण ते भूली गयो छे, भाई!

भाई, अनंत अनंत चोरासीना अवतारमां तुं अनेकवार अबजोपति शेठ थयो, स्वर्गनो देव थयो अने सातमी नरकनो नारकी पण थयो ब्रह्मदत्त चक्रवर्तीनी शास्त्रमां वात आवे छे. ते छ खंडनो स्वामी हतो, छन्नु हजार राणीओ हती. सोळ हजार देवो एनी सेवामां रहेता. रत्न-मणि अने हीराना पलंगमां ए पोढतो. एना वेभवनी शी वात! ते ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती आयुस्थिति पूरी थतां सातमी रौरव नरके उपज्यो. अहीं सातसो वर्षनुं आयुष्य हतुं. अहींथी मरीने त्यां नरकमां ३३ सागरोपम आयुष्यनी स्थितिमां उपज्यो. एक श्वासना मिथ्यात्वनी प्रधानतापूर्वकना अशुभना फळमां अगियार लाख छप्पन हजार पल्योपमनुं नरकनुं दुःख त्यां प्राप्त थयुं. अहा! नरकनी अकथ्य वेदनानुं कथन केम करवुं?

आम शुद्धनयनो पक्ष नहीं थवाथी जीव अनंतकाळथी दुःखी थई रह्यो छे. शुद्धनयनो उपदेश पण देनार कोई नथी. व्रत करो, दया पाळो-एम व्यवहारनो उपदेश तो ठामठाम देनारा छे, पण त्रिकाळी ध्रुव चैतन्य एकमात्रना आलंबनथी धर्म थाय छे एम उपदेश करनार कयांक छे, कदाचित् कोई यथार्थ उपदेशदाता मळ्‌या पण खरा; तो तेमनी वात अंतरमां ग्रहण करी नहीं अने तेथी भवभ्रमण मटयुं नहीं.

आवा भवभ्रमणना दुःखथी मुक्त थवा उपकारी श्री गुरुए शुद्धनयनुं फळ मोक्ष जाणीने एनो उपदेश प्रधानताथी आप्यो छे के-‘शुद्धनय भूतार्थ छे, सत्यार्थ छे, एनो आश्रय करवाथी सम्यग्द्रष्टि थई शकाय छे.’ जुओ, विदेहक्षेत्रमां साक्षात् अरिहंत परमात्मा बिराजे छे. त्यां ॐध्वनिना धोध वरसे छे. ए दिव्यवाणी सांभळवा स्वर्गना इन्द्रो आवे छे. पहेला देवलोकने सौधर्म देवलोक कहेवाय छे. तेमां बत्रीस लाख विमान छे. एकेक विमानमां असंख्य देवो छे. ते बत्रीस लाख विमानोनो स्वामी सौधर्म इन्द्र छे. ते सम्यग्द्रष्टि छे. तेनी इन्द्राणी शची छे. ते पण समकिती छे. बन्ने एक भव करी मोक्ष