जवाना छे. तेओ जे दिव्यध्वनि सांभळवामां आवे छे तेनो सार-सार लई भगवान कुंदकुंदाचार्ये हृदयमां परम करुणा धरी अहीं उपदेश कर्यो छे के शुद्धनय भूतार्थ छे, तेना आश्रये जीव सम्यग्द्रष्टि थाय छे. भगवान कुंदकुंदाचार्य शुद्धनयनुं फळ जे मोक्षमार्ग ते जाणता-अनुभवता हता तेथी भव्य जीवोना उपकार हेतुथी शुद्धनयनो उपदेश प्रधानताथी कर्यो छे.
अहाहा...! आचार्यदेव कहे छे के एकवार तुं द्रष्टि फेरवी नाख. एक समयनी पर्याय उपर, अने भेद उपर अनादिनी द्रष्टि छे. तेने त्यांथी खसेडी लई अखंड एकरूप त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यसामान्य पर द्रष्टि स्थिर कर. तेथी तने सम्यग्दर्शन आदि धर्म प्रगट थशे. तने भव-भ्रमणना दुःखथी मुक्ति थई अनंत सुखस्वरूप एवो मोक्ष थशे. अहो! आवो विरल उपदेश आपी आचार्यदेवे जगतनो महान उपकार कर्यो छे. आत्मा त्रिकाळी सत् ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायक, ध्रुव-ध्रुव-ध्रुव अखंड एकरूप वस्तु छे ते भूतार्थ छे, तेना आश्रये सम्यग्दर्शन थाय छे अने तेना ज आश्रये जन्म-मरण मटे छे, मोक्षना भणकारा वागे छे.
शुद्धनयने एटले त्रिकाळी ध्रुवने जाण्या विना ज्यांसुधी जीव व्यवहारमां मग्न छे एटले के शुभरागना कर्मकांडमां मग्न छे, भेदमां मग्न छे के पर्यायमां मग्न छे त्यांसुधी आत्माना श्रद्धानरूप निश्चय सम्यग्दर्शन प्रगट थतुं नथी. त्रिकाळी शुद्ध आत्मतत्त्वने ओळखी तेमां मग्न थवुं ए ज मुख्य कर्तव्य छे.