Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 12.

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 157 of 4199

 


जीव–अजीव अधिकार
गाथा–१२

सुद्धो
सुद्धादेसो णादव्वो परमभावदरिसीहिं।
ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ट्ठिदा भावे।।
१२।।

शुद्धः शुद्धादेशो ज्ञातव्यः परमभावदर्शिभिः।
व्यवहारदेशिताः पुनर्ये त्वपरमे स्थिता भावे।।
१२।।

देखे
परम जे भाव तेने शुद्धनय ज्ञातव्य छे;
अपरम भावे स्थितने व्यवहारनो उपदेश छे. १२.

हवे, “ए व्यवहारनय पण कोई कोईने कोई वखते प्रयोजनवान छे, सर्वथा निषेध करवायोग्य नथी; तेथी तेनो उपदेश छे” एम कहे छेः-

गाथार्थः– [परमभावदर्शिभिः] जे शुद्धनय सुधी पहोंची श्रद्धावान थया तथा पूर्ण ज्ञान-चारित्रवान थई गया तेमने तो [शुद्धादेशः] शुद्ध (आत्मा)नो उपदेश (आज्ञा) करनार [शुद्धः] शुद्धनय [ज्ञातव्यः] जाणवायोग्य छे; [पुनः] वळी [ये तु] जे जीवो [अपरमे भावे] अपरमभावे-अर्थात् श्रद्धा तथा ज्ञान-चारित्रना पूर्ण भावने नथी पहोंची शकया, साधक अवस्थामां ज-[स्थिताः] स्थित छे तेओ [व्यवहारदेशिताः] व्यवहार द्वारा उपदेश करवायोग्य छे.

टीकाः– जे पुरुषो छेल्ला पाकथी ऊतरेला शुद्ध सुवर्ण समान (वस्तुना) उत्कृष्ट भावने अनुभवे छे तेमने प्रथम, द्वितीय आदि अनेक पाकोनी परंपराथी पच्यमान (पकाववामां आवता) अशुद्ध सुवर्ण समान जे अनुत्कृष्ट (मध्यम) भाव तेनो अनुभव नथी होतो; तेथी, शुद्धद्रव्यने कहेनार होवाथी जेणे अचलित अखंड एकस्वभावरूप एक भाव प्रगट कर्यो छे एवो शुद्धनय ज, सौथी उपरनी एक प्रतिवर्णिका (सुवर्णना वर्ण) समान होवाथी, जाणेलो प्रयोजनवान छे. परंतु जे पुरुषो प्रथम, द्वितीय आदि अनेक