Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १प१

पाकोनी परंपराथी पच्यमान अशुद्ध सुवर्ण समान जे (वस्तुनो) अनुत्कृष्ट (मध्यम) भाव तेने अनुभवे छे तेमने छेल्ला पाकथी ऊतरेला शुद्ध सुवर्ण समान उत्कृष्ट भावनो अनुभव नथी होतो; तेथी, अशुद्ध द्रव्यने कहेनार होवाथी जेणे जुदा जुदा एक एक भावस्वरूप अनेक भावो देखाडया छे एवो व्यवहारनय, विचित्र (अनेक) वर्णमाळा समान होवाथी, जाणेलो ते काळे प्रयोजनवान छे. ए रीते पोतपोताना समयमां बन्ने नयो कार्यकारी छे; कारण के तीर्थ अने तीर्थना फळनी एवी ज व्यवस्थिति छे. (जेनाथी तराय ते तीर्थं छे; एवो व्यवहारधर्म छे. पार थवुं ते व्यवहारधर्मनुं फळ छे; अथवा पोताना स्वरूपने पामवुं ते तीर्थफळ छे.) बीजी जग्याए पण कह्युं छे केः-

जइ जिणमयं पवज्जह ता मा ववहारणिच्छए मुयह।
एक्केण विणा छिज्जइ तित्थं अण्णेण उण तच्चं।।

[अर्थः– आचार्य कहे छे के हे भव्य जीवो! जो तमे जिनमतने प्रवर्ताववा

चाहता हो तो व्यवहार अने निश्चय-ए बन्ने नयोने न छोडो; कारण के व्यवहारनय विना तो तीर्थ-व्यवहारमार्गनो नाथ थई जशे अने निश्चयनय विना तत्त्व (वस्तु) नो नाश थई जशे.]

भावार्थः– लोकमां सोनाना सोळ वाल प्रसिद्ध छे. पंदर-वला सुधी तेमां चूरी

आदि परसंयोगनी कालिमा रहे छे तेथी अशुद्ध कहेवाय छे; अने ताप देतां देतां छेल्ला तापथी ऊतरे त्यारे सोळ-वलुं शुद्ध सुवर्ण कहेवाय छे. जे जीवोने सोळ-वला सोनानुं ज्ञान, श्रद्धान तथा प्राप्ति थई तेमने पंदर-वला सुधीनुं कांई प्रयोजनवान नथी अने जेमने सोळ-वला शुद्ध सोनानी प्राप्ति नथी थई तेमने त्यां सुधी पंदर- वला सुधीनुं पण प्रयोजनवान छे. एवी रीते आ जीव नामनो पदार्थ छे ते पुद्गलना संयोगथी अशुद्ध अनेकरूप थई रह्यो छे. तेना, सर्व परद्रव्योथी भिन्न, एक ज्ञायकपणामात्रनुं ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरणरूप प्राप्ति-ए त्रणे जेमने थई गयां तेमने तो पुद्गलसंयोगजनित अनेकरूपणाने कहेनारो अशुद्धनय कांई प्रयोजनवान (कोई मतलबनो) नथी; पण ज्यां सुधी शुद्ध भावनी प्राप्ति नथी थई त्यां सुधी जेटलुं अशुद्धनयनुं कथन छे तेटलुं यथापदवी प्रयोजनवाळुं छे. ज्यां सुधी यथार्थ ज्ञान-श्रद्धाननी प्राप्तिरूप सम्यग्दर्शननी प्राप्ति न थइ होय त्यां सुधी तो जेमनाथी यथार्थ उपदेश मळे छे एवां जिनवचनोनुं सांभळवुं, धारण करवुं तथा जिनवचनोने कहेनारा श्री जिन-गुरुनी भक्ति, जिनबिंबना दर्शन ईत्यादि व्यवहारमार्गमां प्रवृत्त थवुं प्रयोजनवान छे; अने जेमने श्रद्धान-ज्ञान तो थयां छे पण