Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प२ [ समयसार प्रवचन

(मालिनी)

उभयनयविरोधध्वंसिनि स्यात्पदाङ्के
जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चै–
रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव।।
४।।

_________________________________________________________________ साक्षात् प्राप्ति नथी थई तेमने पूर्वकथित कार्य, परद्रव्यनुं आलंबन छोडवारूप अणुव्रतमहाव्रतनुं ग्रहण, समिति, गुप्ति, पंच परमेष्ठीना ध्यानरूप प्रवर्तन, ए प्रमाणे प्रवर्तनाराओनी संगति करवी अने विशेष जाणवा माटे शास्त्रोनो अभ्यास करवो ईत्यादि व्यवहारमार्गमां पोते प्रवर्तवुं अने बीजाने प्रवर्ताववुं-एवो व्यवहारनयनो उपदेश अंगीकार करवो प्रयोजनवान छे. *व्यवहारनयने कथंचित् असत्यार्थ कहेवामां आव्यो छे; पण जो कोई तेने सर्व असत्यार्थ जाणी छोडी दे तो शुभोपयोगरूप व्यवहार छोडे अने शुद्धोपयोगनी साक्षात् प्राप्ति तो थई नथी, तेथी उलटो अशुभोपयोगमां ज आवी, भ्रष्ट थई, गमे तेम स्वेच्छारूप प्रवर्ते तो नरकादि गति तथा परंपरा निगोदने प्राप्त थई संसारमां ज भ्रमण करे. माटे शुद्धनयनो विषय जे साक्षात् शुद्ध आत्मा तेनी प्राप्ति ज्यां सुधी न थाय त्यां सुधी व्यवहार पण प्रयोजनवान छे-एवो स्याद्वादमतमां श्री गुरुओनो उपदेश छे.

ए अर्थनुं कलशरूप काव्य टीकाकार कहे छेः-

श्लोकार्थः– [उभय नच–विरोध–ध्वंसिनि] निश्चय अने व्यवहार ए बे नयोने विषयना भेदथी परस्पर विरोध छे; ए विरोधने नाश करनारुं [स्यात्–पद अंके] ‘स्यात्’ पदथी चिह्नित [जिनवचसि] जे जिन भगवाननुं वचन (वाणी) तेमां [ये रमन्ते] जे पुरुषो रमे छे (-प्रचुर प्रीति सहित अभ्यास करे छे) [ते] ते पुरुषो [स्वयं] पोतानी मेळे (अन्य कारण विना) [वान्तमोहाः] मिथ्यात्वकर्मना उदयनुं वमन करीने [उच्चः परं ज्योत्तिः समयसारं] आ अतिशयरूप परमज्योति प्रकाशमान शुद्ध आत्माने [सपदि] तुरंत [ईक्षन्ते एव] देखे ज छे. केवो छे समयसाररूप शुद्ध आत्मा? [अनवम्] नवीन _________________________________________________________________ *व्यवहारनयना उपदेशथी एम न समजवुं के आत्मा परद्रव्यनी क्रिया करी शके छे, पण एम समजवुं

के व्यवहारोपद्रिष्ट शुभ भावोने आत्मा व्यवहारे करी शके छे. वळी ते उपदेशथी एम पण न समजवुं
के आत्मा शुभ भावो करवाथी शुद्धताने पामे छे, परंतु एम समजवुं के साधक दशामां भूमिका
अनुसार शुभ भावो आव्या विना रहेता नथी.