जिनवचसि रमन्ते ये स्वयं वान्तमोहाः।
सपदि समयसारं ते परं ज्योतिरुच्चै–
रनवमनयपक्षाक्षुण्णमीक्षन्त एव।। ४।।
_________________________________________________________________ साक्षात् प्राप्ति नथी थई तेमने पूर्वकथित कार्य, परद्रव्यनुं आलंबन छोडवारूप अणुव्रतमहाव्रतनुं ग्रहण, समिति, गुप्ति, पंच परमेष्ठीना ध्यानरूप प्रवर्तन, ए प्रमाणे प्रवर्तनाराओनी संगति करवी अने विशेष जाणवा माटे शास्त्रोनो अभ्यास करवो ईत्यादि व्यवहारमार्गमां पोते प्रवर्तवुं अने बीजाने प्रवर्ताववुं-एवो व्यवहारनयनो उपदेश अंगीकार करवो प्रयोजनवान छे. *व्यवहारनयने कथंचित् असत्यार्थ कहेवामां आव्यो छे; पण जो कोई तेने सर्व असत्यार्थ जाणी छोडी दे तो शुभोपयोगरूप व्यवहार छोडे अने शुद्धोपयोगनी साक्षात् प्राप्ति तो थई नथी, तेथी उलटो अशुभोपयोगमां ज आवी, भ्रष्ट थई, गमे तेम स्वेच्छारूप प्रवर्ते तो नरकादि गति तथा परंपरा निगोदने प्राप्त थई संसारमां ज भ्रमण करे. माटे शुद्धनयनो विषय जे साक्षात् शुद्ध आत्मा तेनी प्राप्ति ज्यां सुधी न थाय त्यां सुधी व्यवहार पण प्रयोजनवान छे-एवो स्याद्वादमतमां श्री गुरुओनो उपदेश छे.
ए अर्थनुं कलशरूप काव्य टीकाकार कहे छेः-
श्लोकार्थः– [उभय नच–विरोध–ध्वंसिनि] निश्चय अने व्यवहार ए बे नयोने विषयना भेदथी परस्पर विरोध छे; ए विरोधने नाश करनारुं [स्यात्–पद अंके] ‘स्यात्’ पदथी चिह्नित [जिनवचसि] जे जिन भगवाननुं वचन (वाणी) तेमां [ये रमन्ते] जे पुरुषो रमे छे (-प्रचुर प्रीति सहित अभ्यास करे छे) [ते] ते पुरुषो [स्वयं] पोतानी मेळे (अन्य कारण विना) [वान्तमोहाः] मिथ्यात्वकर्मना उदयनुं वमन करीने [उच्चः परं ज्योत्तिः समयसारं] आ अतिशयरूप परमज्योति प्रकाशमान शुद्ध आत्माने [सपदि] तुरंत [ईक्षन्ते एव] देखे ज छे. केवो छे समयसाररूप शुद्ध आत्मा? [अनवम्] नवीन _________________________________________________________________ *व्यवहारनयना उपदेशथी एम न समजवुं के आत्मा परद्रव्यनी क्रिया करी शके छे, पण एम समजवुं
के आत्मा शुभ भावो करवाथी शुद्धताने पामे छे, परंतु एम समजवुं के साधक दशामां भूमिका
अनुसार शुभ भावो आव्या विना रहेता नथी.