Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १प३

(मालिनी)

व्यवहरणनयः स्याद्यद्यपि प्राक्पदव्या–
मिह निहितपदानां हन्त हस्तावलम्बः।
तदपि परममर्थ चिच्चमत्कारमात्रं
परविरहितमन्तः पश्यतां नैष किञ्चित।।
५।।

__________________________________________________________________ उत्पन्न थयो नथी, पहेलां कर्मथी आच्छादित हतो ते प्रगट व्यक्तिरूप थई गयो छे. वळी केवो छे? [अनय–पक्ष–अक्षुप्णम्] सर्वथा एकांतरूप कुनयना पक्षथी खंडित थतो नथी, निर्बाध छे.

भावार्थः– जिनवचन (वाणी) स्याद्वादरूप छे. ज्यां बे नयोने विषयनो

विरोध छे-जेम केः जे सत्रूप होय ते असत्-रूप न होय, एक होय ते अनेक न होय, नित्य होय ते अनित्य न होय, भेदरूप होय ते अभेदरूप न होय, शुद्ध होय ते अशुद्ध न होय ईत्यादि नयोना विषयोमां विरोध छे-त्यां जिनवचन कथंचित् विवक्षाथी सत्-असत्रूप, एक-अनेकरूप, नित्य-अनित्यरूप, भेद-अभेदरूप, शुद्ध- अशुद्धरूप जे रीते विद्यमान वस्तु छे ते रीते कहीने विरोध मटाडी दे छे, जूठी कल्पना करतुं नथी. ते जिनवचन द्रव्यार्थिक अने पर्यायार्थिक-ए बे नयोमां, प्रयोजनवश शुद्धद्रव्यार्थिक नयने मुख्य करीने तेने निश्चय कहे छे अने अशुद्धद्रव्यार्थिकरूप पर्यायार्थिकनयने गौण करी तेने व्यवहार कहे छे.-आवा जिनवचनमां जे पुरुष रमण करे छे ते आ शुद्ध आत्माने यथार्थ पामे छे; अन्य सर्वथा -एकांती सांख्यादिक ए आत्माने पामता नथी, कारण के वस्तु सर्वथा एकांत पक्षनो विषय नथी तोपण तेओ एक ज धर्मने ग्रहण करी वस्तुनी असत्य कल्पना करे छे-जे असत्यार्थ छे, बाधा सहित मिथ्याद्रष्टि छे. ४.

आ रीते बार गाथाओमां पीठिका (भूमिका) छे.

हवे आचार्य शुद्धनयने प्रधान करी निश्चय सम्यक्त्वनुं स्वरूप कहे छे. अशुद्धनयनी (व्यवहारनयनी) प्रधानतामां जीवादि तत्त्वोना श्रद्धानने सम्यक्त्व कह्युं छे तो अहीं ए जीवादि तत्त्वोने शुद्धनय वडे जाणवाथी सम्यक्त्व थाय छे एम कहे छे. त्यां टीकाकार एनी सूचनारूपे त्रण श्लोक कहे छे; तेमां पहेलां श्लोकमां एम कहे छे के व्यवहारनयने कथंचित् प्रयोजनवान कह्यो तोपण ते कांई वस्तुभूत नथीः-