Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१प४ [ समयसार प्रवचन

(शार्दूलविक्रीडित)

एकत्वे नियतस्य शुद्धनयतो व्याप्तुर्यदस्यात्मनः
पूर्णंज्ञानघनस्य दर्शनमिह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक्।
सम्यग्दर्शनमेतदेव नियमादात्मा च तावानयं
तन्मुक्त्वा नवतत्त्वसन्ततिमिमामात्मायमेकोऽस्तु नः।।
६।।

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श्लोकार्थः– [व्यवहरण–नयः] जे व्यवहारनय छे ते [यद्यपि] जो के [इह

प्राक्–पदव्यां] आ पहेली पदवीमां (ज्यां सुधी शुद्ध स्वरूपनी प्राप्ति न थई होय त्यां सुधी) [निहित–पदानां] जेमणे पोतानो पग मांडेलो छे एवा पुरुषोने, [हन्त] अरेरे! [हस्तावलम्बः स्यात्] हस्तावलंब तुल्य कह्यो छे, [तद्–अपि] तोपण [चित्–चमत्कार–मात्रं पर–विरहितं परमं अर्थ अन्तः पश्यतां] जे पुरुषो चैतन्यचमत्कारमात्र परद्रव्यभावोथी रहित (शुद्धनयना विषयभूत) परम ‘अर्थ’ ने अंतरंगमां अवलोके छे, तेनी श्रद्धा करे छे तथा तद्रूप लीन थई चारित्रभावने प्राप्त थाय छे. तेमने [एषः] ए व्यवहारनय [किञ्चित् न] कांईपण प्रयोजनवान नथी.

भावार्थः– शुद्ध स्वरूपनुं ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरण थया बाद अशुद्धनय

कांईपण प्रयोजनकारी नथी.प

हवे पछीना श्लोकमां निश्चय सम्यक्त्वनुं स्वरूप कहे छेः-

श्लोकार्थः– [अस्य आत्मनः] आ आत्माने [यद् इह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक दर्शनम्] अन्य द्रव्योथी जुदो देखवो (श्रद्धवो) [एतत् एव नियमात् सम्यग्दर्शनम्] ते ज नियमथी सम्यग्दर्शन छे. केवा छे आत्मा? [व्याप्तुः] पोताना गुण-पर्यायोमां व्यापनारो छे. वळी केवो छे? [शुद्धनयतः एकत्वे नियतस्य] शुद्धनयथी एकपणामां निश्चित करवामां आव्यो छे. वळी केवो छे? [पूर्ण–ज्ञान–घनस्य] पूर्णज्ञानघन छे. [च] वळी [तावान् अयं आत्मा] जेटलुं सम्यग्दर्शन छे तेटलो ज आ आत्मा छे. [तत्] तेथी आचार्य प्रार्थना करे छे के “[इमाम् नव–तत्त्व–सन्ततिं मुक्त्वा] नवतत्त्वनी परिपाटीने छोडी, [अयम् आत्मा एकः अस्तु नः] आ आत्मा एक ज अमने प्राप्त हो.”

भावार्थः– सर्व स्वाभाविक तथा नैमित्तिक पोतानी अवस्थारूप गुणपर्याय- भेदोमां व्यापनारो आ आत्मा शुद्धनयथी एकपणामां निश्चित करवामां आव्यो