--शुद्धनयथी ज्ञायकमात्र एक-आकार देखाडवामां आव्यो, तेने सर्व अन्यद्रव्यो अने अन्यद्रव्योना भावोथी न्यारो देखवो, श्रद्धवो ते नियमथी सम्यग्दर्शन छे. व्यवहारनय आत्माने अनेक भेदरूप कही सम्यग्दर्शनने अनेक भेदरूप कहे छे त्यां व्यभिचार (दोष) आवे छे, नियम रहेतो नथी. शुद्धनयनी हदे पहोंचतां व्यभिचार रहेतो नथी तेथी नियमरूप छे. केवो छे शुद्धनयनो विषयभूत आत्मा? पूर्णज्ञानघन छे -सर्व लोकालोकने जाणनार ज्ञानस्वरूप छे. एवा आत्माना श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन छे. ते कांई जुदो पदार्थ नथी-आत्माना ज परिणाम छे, तेथी आत्मा ज छे. माटे सम्यग्दर्शन छे ते आत्मा छे, अन्य नथी.
अहीं एटलुं विशेष जाणवुं के नय छे ते श्रुतप्रमाणनो अंश छे तेथी शुद्धनय पण श्रुतप्रमाणनो ज अंश थयो. श्रुतप्रमाण छे ते परोक्ष प्रमाण छे कारण के वस्तुने सर्वज्ञनां आगमनां वचनथी जाणी छे; तेथी आ शुद्धनय सर्व द्रव्योथी जुदा, आत्माना सर्व पर्यायोमां व्याप्त, पूर्ण चैतन्य केवळज्ञानरूप-सर्व लोकालोकने जाणनार, असाधारण चैतन्यधर्मने परोक्ष देखाडे छे. आ व्यवहारी छद्मस्थ जीव आगमने प्रमाण करी, शुद्धनये दर्शावेला पूर्ण आत्मानुं श्रद्धान करे ते श्रद्धान निश्चय सम्यग्दर्शन छे. ज्यां सुधी केवळ व्यवहारनयना विषयभूत जीवादिक भेदरूप तत्त्वोनुं ज श्रद्धान रहे त्यां सुधी निश्चय सम्यग्दर्शन नथी तेथी आचार्य कहे छे के ए नव तत्त्वोनी संततिने (परिपाटीने) छोडी शुद्धनयनो विषयभूत एक आत्मा ज अमने प्राप्त हो; बीजुं कांई चाहता नथी. आ वीतराग अवस्थानी प्रार्थना छे, कोई नयपक्ष नथी. जो सर्वथा नयोनो पक्षपात ज थया करे तो मिथ्यात्व ज छे.
अहीं कोई प्रश्न करे के -आत्मा चैतन्य छे एटलुं ज अनुभवमां आवे, तो एटली श्रद्धा ते सम्यग्दर्शन छे के नहि? तेनुं समाधानः-चैतन्यमात्र तो नास्तिक सिवाय सर्व मतवाळाओ आत्माने माने छे; जो एटली ज श्रद्धाने सम्यग्दर्शन कहेवामां आवे तो तो सौने सम्यक्त्व सिद्ध थई जशे. तेथी सर्वज्ञनी वाणीमां जेवुं पूर्ण आत्मानुं स्वरूप कह्युं छे तेवुं श्रद्धान थवाथी ज निश्चय सम्यक्त्व थाय छे एम समजवुं. ६.
हवे, ‘त्यार पछी शुद्धनयने आधीन, सर्व द्रव्योथी भिन्न, आत्मज्योति प्रगट थई जाय छे’ एम आ श्लोकमां टीकाकार आचार्य कहे छेः-
श्लोकार्थः– [अतः] त्यार बाद [शुद्धनय आयतं] शुद्धनयने आधीन [प्रत्यगज्योतिः] जे भिन्न आत्मज्योति छे [तत्] ते [चकास्ति] प्रगट थाय छे [यद्] के