व्यापनारो छे; आत्मा परमां व्यापेलो नथी एम कहेवुं छे. पोताना द्रव्य-गुण-पर्यायमां व्यापीने पोतानुं अस्तित्व छे, परमां नहीं. हवे द्रव्य-गुण-पर्यायथी व्याप्त छे जे आत्मा, ते सम्यग्दर्शननो विषय नथी. अहीं तो आत्मा पोताना गुण-पर्यायोमां व्यापे छे एटलुं अस्तित्व सिद्ध करवुं छे.
निश्चित करवामां आव्यो छे. आत्मा पोताना ज्ञान, दर्शन, आदि गुणो अने पर्यायोमां व्यापनारो होवा छतां शुद्धनयथी तेने एकपणामां नियत करवामां आव्यो छे. जेमां गुण-गुणीना के पर्यायना भेदो नथी एवो अभेद एकरूप त्रिकाळी आत्मा शुद्धनय वडे बताववामां आव्यो छे. वळी ते केवो छे? ‘पूर्ण–ज्ञान–घनस्य’ पूर्णज्ञानघन छे. जेमां पर्याय के भेदनो प्रवेश नथी एवो ज्ञानस्वरूप सर्वज्ञस्वभावी छे. अहीं ज्ञानगुणनी प्रधानताथी कथन छे. शुद्धनय आत्मवस्तुने त्रिकाळ एकरूप अभेद ज्ञायकमात्र चैतन्यघनस्वरूप देखाडे छे अने ते सम्यग्दर्शननो विषय छे. तेमां एकाग्र थतां सम्यग्दर्शन थाय छे.
छे. पूर्णज्ञानघन एकरूप जे आत्मा तेना आश्रये जे प्रतीति-श्रद्धा थई, सम्यग्दर्शन थयुं ते आत्मानुं परिणाम छे तेथी जेटलुं सम्यग्दर्शन छे तेटलो आत्मा छे एम कह्युं छे. सम्यग्दर्शननुं परिणाम आत्माथी भिन्न नथी.
नवतत्त्वनी परिपाटीने छोडीने ‘अयम् आत्मा एकः अस्तु नः’ आ आत्मा एक ज अमने प्राप्त हो. अहीं नव तत्त्व कह्यां. तेमां जीव-अजीव द्रव्यो छे. दया दानना परिणाम पुण्य छे, तथा हिंसा, जूठ, चोरी आदि पाप छे. पुण्य अने पाप बंने आस्रव छे. ए नवा कर्म आववानुं कारण छे. तेने रोकनार संवर छे. विशेष शुद्धि थाय ते निर्जरा छे. तथा बंध छे ते कर्म बंधावामां निमित्त छे. परिपूर्ण शुद्धदशा थाय ते मोक्ष छे. अहीं आचार्य कहे छे के आ नवतत्त्वनी परिपाटीने छोडीने शुद्धनयनो विषय जे ध्रुव आत्मा ते अमोने प्राप्त थाओ, बीजुं कांई चाहता नथी. आ वीतरागी अवस्थानी प्रार्थना छे. कोई नयपक्ष नथी. निश्चयनयनो एकनो पक्ष छे अने बीजो पक्ष छे ज नहीं एम नथी. (एकलो निश्चयनय ज छे अने व्यवहारनय नथी एम नथी) निश्चयनो पक्ष एकांत कर्या करे तो मिथ्यात्व थशे. (व्यवहारनय विषयने जाणवामां थी पण काढी नाखे तो मिथ्यात्व थशे) अहीं तो राग अने भेद पर लक्ष जतां राग थाय छे माटे एक अभेदना अनुभवनी, वीतरागतानी प्रार्थना करी छे. आ एक ज प्राप्त थाओ एटले राग अने