Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १७७

मलिनता छे, व्यवहार छे. अभेदमांथी भेदना लक्षे जवुं ए पण मलिनता छे. सातमी गाथामां आवे छे के आत्मामां दर्शन, ज्ञानना भेद पडे छे ए अशुद्धनय छे. त्रिकाळीनी अपेक्षाए भेदने अशुद्ध कह्यो छे. अर्थकारे विशेष स्पष्ट करवा ‘अशुद्ध’ शब्द वापरीने व्यवहारने अशुद्धनय कह्यो अने त्रिकाळीने शुद्ध कह्यो छे.

हवे पछीना श्लोकमां निश्चय सम्यक्त्वनुं स्वरूप कहे छेः-

* कळश–६ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

भाई! आत्मा तो अनादि-अनंत सच्चिदानंदस्वरूप छे. तेनो निर्णय कर्या विना जीव अनंतकाळथी चोरासी लाख योनिमां जन्म-मरणरूप परिभ्रमण वडे महादुःखी छे. राजा, रंक, देव वगेरे बधा दुःखी छे. राजा हो के देव हो, हजु पण वस्तुनुं भान (ज्ञान-श्रद्धान) नहीं करे तो कागडा, कूतरा, वगेरे अवतार करी दुःखी थशे. मिथ्यात्वनुं सेवन करनारा प्रायः तिर्यंचमां जन्मवाना छे. मिथ्यात्व छे ते आडोडाई छे, वास्तविक तत्त्वथी विपरीत श्रद्धा छे. जुओ, मनुष्य छे ते (सीधा) ऊभा छे, त्यारे गाय, भेंसनां शरीर आडां छे. आडोडाई करी तेथी आडा शरीरनो संयोग छे. शास्त्रमां मिथ्यात्वीने पशु कह्या छे. आ (छठ्ठा) कळशमां दुःख टळी सुख केम प्राप्त थाय, सम्यग्दर्शन केम प्राप्त थाय, एनी वात करी छे. सम्यग्दर्शन एटले साची प्रतीति. धर्मनी शरूआत सम्यग्दर्शनथी थाय छे.

शुं कहे छे? ‘अस्य आत्मनः’ आ आत्माने एटले आ प्रत्यक्ष विद्यमान आत्माने ‘यह इह द्रव्यान्तरेभ्यः पृथक् दर्शनम्’ अन्य द्रव्योथी जुदो देखवो (श्रद्धवो), ‘एतत् एव नियमात् सम्यग्दर्शनम्’ एने ज निश्चयथी सम्यग्दर्शन कहीए छीए. आमां त्रण न्याय आव्या (१) स्वद्रव्य छे (२) एनाथी अनेरा (भिन्न) द्रव्यो छे. अने (३) रागादि छे. त्यां पोताथी भिन्न जे अनेरा द्रव्यो अने रागादि भाव छे तेनाथी पृथक् थईने-भिन्न पडीने एक निज आत्मद्रव्यनो अनुभव करवो ए ज सम्यग्दर्शन छे. बीजामां, रागमां भेळवीने देखवो एम नहीं, ए मान्यता तो अज्ञान अने मिथ्यात्व छे. अहीं तो कहे छे के जे त्रिकाळी ज्ञायकभाव सच्चिदानंदस्वरूप भगवान आत्मा ते एकने ज देखवो-अनुभववो, तेनी सम्यक्प्रतीति करवी ए सम्यग्दर्शन छे.

हवे कहे छे केवो छे ते आत्मा? तो ‘व्याप्तुः’ एटले पोताना गुण-पर्यायोमां व्यापनारो छे. अहीं आत्मा छे ते पोताना गुणो जे ज्ञान, दर्शन, आनंद वगेरे छे ते अनंत गुणोमां, तथा ते अनंत गुणोनी वर्तमान अवस्थाओ -विकारी के अविकारी - एमां