परमं अर्थं अन्तः पश्यताम्’ जे पुरुषो चैतन्य-चमत्कारमात्र, परद्रव्योना भावोथी रहित शुद्धनयना विषयभूत परम ‘अर्थ’ने एटले ज्ञायक परमात्माने अंतरंगमां अवलोके छे, प्रत्यक्ष तेनी श्रद्धा करे छे तथा तद्रूप लीन थईने चारित्रभावने प्राप्त करे छे तेमने ‘एषः’ ए व्यवहारनय ‘किञ्चित् न’ कांई पण प्रयोजनवान नथी, एटले पछी तेमने व्यवहार होतो नथी.
आगळ ४१प गाथानी टीकामां आवे छे के- ‘अर्थथी अने तत्त्वथी जाणीने, तेना ज अर्थभूत भगवान एक पूर्णविज्ञानघन परम ब्रह्ममां सर्व उद्यमथी स्थित थशे,.. .’ तत्त्वथी अने अर्थथी जाणीने एटले तत्त्वने जाणे भले, पण अर्थ नाम पदार्थ छे जे त्रिकाळी ध्रुव एमां ठरे छे जे, ते मोक्षने प्राप्त करशे, ते परमसुखरूप परिणमशे, सुखरूप थई जशे. तत्त्व एटले पदार्थनो भाव, अर्थ एटले पदार्थ भाववान. भाववानने एना भावथी जाणीने तेना अर्थभूत पूर्णविज्ञानघन परमब्रह्ममां सर्व उद्यमथी स्थित थशे ते आत्मा साक्षात् तत्क्षण प्रगट थता एक चैतन्यरसथी भरेला स्वभावमां सुस्थित अने निराकुळ होवाने लीधे अनाकुळता- लक्षण एवा सौख्यरूपे पोते ज थई जशे. अहीं कळशमां परविरहित एटले रागादि परभावोथी भिन्न जे परम ‘अर्थ,’ चैतन्यचमत्कारमात्र ध्रुव स्वभावभाव-ज्ञायकभाव पदार्थ तेने ‘अन्तः पश्यतां’ -जेओ अंतरंगमां अवलोके छे, तद्रूप लीन थईने पूर्ण वीतरागताने प्राप्त थाय छे, परम सौख्यरूपे परिणमे छे तेमने कोई व्यवहार रहेतो नहीं होवाथी व्यवहार प्रयोजनवान नथी एम कह्युं छे.
केटलाक लोको ‘व्यवहार कार्यकारी छे’ एनो अर्थ एम करे छे के व्यवहार कामनो छे अने आदरवा जेवो छे. तेमनो ए अर्थ (समज) बराबर नथी. व्यवहार कार्यकारी छे एटले जे ते काळे व्यवहार होय छे अने ते जाणवा लायक छे. साधकने (शुद्धनयनो) पूर्ण आश्रय नथी, पण आश्रय शरू थइ गयो छे ते काळमां पर्यायमां आवो व्यवहार होय छे, ते ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे.
शुद्ध स्वरूपनुं ज्ञान, श्रद्धान तथा आचरण थया बाद अशुद्धनय कांईपण प्रयोजनकारी नथी. जोयुं? व्यवहारनयने अशुद्ध कह्यो, अशुद्ध शब्द वापर्यो छे. भगवान आत्मा सच्चिदानंदस्वरूप पोते छे ए तो शुद्धनयनो विषय छे. अने एनां श्रद्धा-ज्ञान थवा छतां पूर्णता नथी एने वचमां व्यवहार आवे छे एने अशुद्धनय कह्यो छे. १६मी गाथामां आवे छे के दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ पर्याय उपर लक्ष जवुं ते मेचक छे,