रहेतो नथी. आत्मा (गुरुनी सहाय विना) सीधो पोताने जाणे छे. अनुभवे छे, गुरुना आश्रये तो नहीं, पण गुरुए जे देशना करी अने तेथी जे परलक्षी ज्ञान थयुं ते (परलक्षी) ज्ञानना आश्रये पण सम्यग्दर्शन थतुं नथी. शुद्ध ज्ञायकभाव-जे छठ्ठी गाथामां प्रमत्त-अप्रमत्तदशा रहित कह्यो छे अने ११मी गाथामां जे एकने भूतार्थ कह्यो छे ते ज्ञायकभावनो आश्रय ए एक ज उपाय छे. ए भूतार्थना आश्रये ज सम्यग्दर्शन थाय छे.
श्रीमदे कह्युं छे ने के- “ए दिव्य शक्तिमान जेथी जंजिरेथी नीकळे.” भगवान दिव्य शक्तिमान-अनंत आनंद, अनंत ज्ञान, अनंत वीर्य, अनंत स्वच्छता, ईत्यादि शक्तिओथी भरेलो भगवान आत्मा जंजिरमां एटले केदमां छे तेमांथी मुक्त थाय. रागनी एकता अने परनुं अवलंबन ए बधुं केद छे. शुं एना अवलंबने आत्मानुं ज्ञान थाय? कदी न थाय. भगवान आत्मा चैतन्यना तेजथी दिव्यपणे बिराजे छे. एने सीधो ज आश्रय करी विश्वासमां-प्रतीतिमां लेतां ज्ञान थाय, त्यारे ते दिव्य शक्तिमान छे एम जणाय.
एक भाईए प्रश्न कर्यो हतो के-तमे त्रिकाळी आत्माने कारण-परमात्मा केम कहो छो? कारण होय तो कार्य आववुं जोईए ने?
समाधानः– त्रिकाळी आत्मा, कारण-परमात्मा, कारणभगवान, स्वभावभाव, भूतार्थभाव, ज्ञायकभाव ए बधुं एकार्थवाचक छे. ए कारण तो कार्य आपे ज, पण कोने? के जेणे कारण-परमात्माने मान्यो तेने. कारण वस्तु तो छे ज, चैतन्यना तेजथी भरपूर अने अनंत अनंत शक्तिओना सामर्थ्य थी परिपूर्ण भरेलो चैतन्यसूर्य भगवान आत्मा प्रकाशमान तो छे ज, पण कोने? के जेने ज्ञाननी पर्यायमां जणायो तेने. पर्याय ज्ञायकमां भळ्या विना, पर्याय पर्यायपणे रहीने ज्ञायकनी प्रतीति करे छे. छठ्ठी गाथामां आवे छे ने के ‘ते ज (ज्ञायकभाव) समस्त अन्य द्रव्योना भावोथी भिन्नपणे उपासवामां आवतो “शुद्ध” कहेवाय छे. ज्ञायकभाव तो शुद्ध ज छे, पण स्वसन्मुख थईने जे ‘शुद्ध’ नी ज्ञान अने प्रतीति करे छे तेने ते ‘शुद्ध’ छे एम जणाय छे. अरे खेद छे के जे छती चीज छे एने नथी एम कहे छे अने राग अने अल्पज्ञ पर्याय ते हुं एम जाणतो पोताने केदमां नाखी दीधो छे!
कळशटीकामां (आ श्लोकना अर्थमां) अज्ञानीने भेदथी समजाववानी वात लीधी छे. अज्ञानीने गुण-गुणीना भेदरूप कथन द्वारा आत्मानुं स्वरूप समजावे छे. जेमके जीवनुं लक्षण चेतना एम कहीने आत्मा समजावे छे.