जाणेलो प्रयोजनवान कह्यो, तोपण ते कांई वस्तुभूत नथी. एटले के व्यवहारनय कांई कार्यकारी नथी. जाणवानी अपेक्षाए प्रयोजनवान कह्यो पण त्यां लक्ष राखवुं एम नथी. अंतरमां चैतन्यमां जवुं, त्यां व्यवहार कांई रहेतो नथी.
ज्यां सुधी शुद्ध स्वरूपनी प्राप्ति न थई होय त्यांसुधी पहेली पदवीमां ‘निहित– पदानां’ जेमणे पग मांडेलो छे एवा पुरुषोने ‘हन्त’ अरेरे! ‘हस्तावलंब स्यात्’ हस्तावलंब तुल्य कह्यो छे. शुं कह्युं? पहेली पदवीमां एटले जे त्रिकाळ शुद्ध अखंड एक चैतन्यभाव तेनी द्रष्टि थतां सम्यग्दर्शन थयुं, तेनो अनुभव थयो पण पूर्ण चारित्र अने पूर्णज्ञान केवळज्ञाननी प्राप्ति थई नथी एवी दशामां शुद्धता अने अशुद्धताना अंशोरूप व्यवहार होय छे. गुणस्थान आदि व्यवहारनय (निश्चय द्रष्टिमां) अभूतार्थ एटले आश्रय करवा लायक नहीं होवा छतां आत्मानो अनुभव थया पछी पण ए व्यवहार होय छे. तेने हस्तावलंब तुल्य कही जाणेलो प्रयोजनवान छे. बस, आटली वात छे.
हस्तावलंबन तुल्य कह्यो ने? एटले जेम माणस निसरणी उपर चढे छे त्यारे निसरणीना कठेडा उपर हाथनो टेको लई चढे छे. त्यां हस्तावलंबन मात्र निमित्त छे. (चढे छे तो पोते), तेम अहीं जीव पण आत्मानो जे शुद्ध चैतन्यघनस्वभाव तेना आश्रये चढे छे, पण पूर्णता न थाय त्यां लगी अपूर्णता छे. ते पर्यायगत अपूर्णताना भेदोने यथास्थित जाणवा ते हस्तावलंब समान छे. ते निमित्त छे. (पूर्णता तो ‘शुद्ध’ नो पूर्ण आश्रय थतां थशे.).
बनारसीदासे हस्तावलंबनो अर्थ एम कर्यो छे के-जेम कोई पहाड उपरथी पडतो होय तेनो हाथ मजबुत पकडी पडतो रोकी राखे. आ निमित्तनुं कथन छे. परमअध्यात्मतरंगिणीमां एवो भाव प्रगट कर्यो छे के - ‘खेद छे के आवो भाव आवे छे. अमारुं चाले तो व्यवहारनो आश्रय न लईए, पण शुं थाय? अपूर्णता छे एटले आव्या वगर रहेतो नथी.’ कळश-टीकाकारे एम अर्थ कर्यो छे के-‘जो के व्यवहारनय हस्तावलंब छे, तोपण कांई नथी, ‘नोंध’ (ज्ञान, समज) करतां जूठो छे.
सम्यग्दर्शन थया पहेलां जे व्यवहारनी वात १२मी गाथाना भावार्थमां हती ए व्यवहार यथार्थ नथी. निमित्त, राग अने पर्यायनी अपेक्षा विना सीधा द्रव्यना आश्रये सम्यग्दर्शन थाय छे. ए सम्यग्द्रष्टिने पूर्णता थई न होवाथी रागांश आव्या विना