Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १७३

उपादेय कही छे जे शुद्ध जीववस्तु त्रिकाळी ज्ञायकभाव तेमां स्थापीने अभ्यास करी रमे छे (एटले तेमां एकाग्र थई क्रिडा करे छे) ते शुद्ध आत्माने यथार्थ पामे छे. तेने शुद्धात्मानो प्रत्यक्ष अनुभव थाय छे. वस्तु तो शुद्ध छे, पण तेनी द्रष्टि करतां ‘शुद्ध छे’ एवो अनुभव यथार्थ थाय छे. अहो! भारतना लोकोनां महाभाग्य छे के केवळीना विरह भुलावे एवुं आ समयसार शास्त्र रचाई गयुं छे.

वीतरागनो मार्ग कोई अलौकिक छे, भाई! एना यथार्थ ज्ञान विना श्रद्धा थाय नहीं. अने यथार्थ श्रद्धा विना सम्यग्दर्शनादि अनुभव थाय नही. लोको बहारथी हो-हा करे, प्रभावना करे अने एमां धर्म माने पण प्रभावना ते बहार थती हशे के अंदर पर्यायमां? प्रभावना पोतानुं लक्ष करतां पोतानी पर्यायमां थाय छे.

पुरुष शब्दनो अर्थ आत्मा समजवो. रमण शब्दना बे अर्थ छे. रमण करे छे एटले आक्रमे छे. परम अध्यात्मतरंगिणीमां ‘रमन्ते’ एटले क्रीडा करे छे, वस्तुमां एकाग्र थईने क्रीडा करे छे एम लीधुं छे. ज्ञानी बहार क्रीडा करवा जता नथी.

आम तो आत्मा, आत्मा कहेनारा घणा छे. वेदांतादिवाळा बहु कहे छे के अमने आत्मानो अनुभव छे, साक्षात्कार छे. पण ए बधी ठेकाणा वगरनी वातो छे. जिनवचनमां वस्तुने मुख्य-गौण करीने सिद्ध करी छे. वस्तु विद्यमान छे, तेमां, जिनवाणीमां कहेलां त्रिकाळ स्वभावमां द्रष्टि करतां जे शुद्ध छे ते (यथार्थपणे) शुद्धने पामे छे. परंतु सर्वथा एकांत कहेनारा सांख्य, बौद्ध, वेदांतादि वस्तुनी स्थितिने नहीं जाणनार आत्माने प्राप्त करता नथी, एटले के तेमने शुद्ध आत्मानो अनुभव थतो नथी. कारण के वस्तु सर्वथा एकांत पक्षनो विषय नथी. वेदांत एक ज धर्मने ग्रहण करी सर्वथा नित्य छे एम कहे छे, ने बौद्ध अनेक कहे छे. एम वस्तुनी असत्य कल्पना करे छे, तेथी असत्यार्थ छे, बाधा सहित मिथ्या द्रष्टि छे. परंतु वस्तु जेवी छे तेवी मर्यादा जाणनारी द्रष्टि ज सम्यक् छे.

आ रीते बार गाथाओमां पीठिका (भूमिका) कही.

हवे आचार्य शुद्धनयने प्रधान करी, शुद्धनयने मुख्य करी निश्चय सम्यक्त्वनुं स्वरूप कहे छे. अशुद्धनयनी (व्यवहारनयनी) प्रधानतामां जीवादि तत्त्वोना भेदवाळी श्रद्धाने सम्यक्त्व कह्युं छे. अहीं जीवादि तत्त्वोने शुद्धनय वडे जाणवाथी समकित थाय छे एम कहे छे.

हवे १३ मी गाथानी शरूआत करता पहेलां एनी सूचनारूपे त्रण श्लोक कहे छे त्यां पहेला श्लोकमां एम कहेशे के -व्यवहारनयने कथंचित् प्रयोजनवान कह्यो- एटले