जोईए. हवे बे नयोमां परस्पर विषयनो विरोध छे. निश्चयथी व्यवहारने विरोध छे अने व्यवहारथी निश्चयने. तेथी बन्ने नय आदरणीय केम थई शके? जेमके द्रव्य सत् ए असत्रूप न होय एम लोकोने लागे छे, पण एम नथी. स्याद्वाद तेनुं समाधान करी नाखे छे के जे स्वथी सत् छे ते परथी असत् छे. द्रव्यथी सत् छे, पर्यायथी असत् छे. वळी एक होय ते अनेक केम होय? तो कहे छे होय. वस्तु तरीके एक छे, पर्याय तरीके, गुणभेद तरीके अनंत छे. नित्य होय ते अनित्य केम होय? तो कहे छे वस्तु कायम टकनारी छे ते अपेक्षाए नित्य छे, अने बदलती पर्याय अपेक्षाए अनित्य छे. तेम त्रिकाळी द्रव्यनी अपेक्षाए अभेद छे, अने पर्याय अने रागनी अपेक्षाए भेद छे. तथा शुद्ध होय ते अशुद्ध केम होय? तो त्रिकाळी द्रव्यनी अपेक्षाए शुद्ध छे, पर्यायनी अपेक्षाए अशुद्ध छे. आ स्याद्वाद छे. अहीं प्रश्न थाय के द्रव्य शुद्ध छे तो पर्यायमां अशुद्धता आवी कयांथी? समाधान एम छे के पर्यायमां अशुद्धतानो धर्म छे, एवी योग्यता छे. अशुद्धता कर्मने लईने आवी नथी, अशुद्धता पर्यायनो धर्म छे.
ईत्यादि नयोना विषयोमां विरोध छे, जेम सत् होय ते असत् न होय, एकमां अनेक न होय, ईत्यादि त्यां भगवान सर्वज्ञदेवनी वाणी कथंचित् विवक्षाथी एटले कोई अपेक्षाए कहेवानी शैलीथी कथन करीने बे नयो सिद्ध करे छे तथा वस्तु सत्-असत्रूप, एक-अनेकरूप, नित्य-अनित्यरूप, भेद-अभेदरूप, शुद्ध-अशुद्धरूप जे रीते विद्यमान-हयात छे ते रीते कहीने विरोध मटाडी दे छे आम जिनवचन स्याद्वाद वडे वस्तुने जेम छे तेम सिद्ध करे छे, जूठी कल्पना करतुं नथी. वस्तुमां जे होय एनी वात करे छे, जे नथी एनी वात करतुं नथी. पहेलां (अज्ञान दशामां) एम निर्णय हतो के हुं रागादिस्वरूपज (अशुद्ध) छुं. पछी स्वभावनुं भान थतां एम निर्णय थयो के ‘हुं शुद्ध छुं’. ए पर्यायमां ‘शुद्ध’ नो अनुभव थाय छे, निर्णय थाय छे. आम स्याद्वाद वस्तु जे रीते शुद्ध अशुद्ध आदि छे ते रीते अविरोधपणे साधे छे.
हवे आत्माने सम्यग्दर्शन थाय ए प्रयोजन छे. आ प्रयोजन साधवा माटे शुद्ध द्रव्यार्थिकनयने एटले शुद्ध त्रिकाळी ज्ञायकभावने मुख्य करीने निश्चय कहे छे. तथा अशुद्ध द्रव्यार्थिकरूपे पर्यायार्थिकनयने गौण करीने व्यवहार कहे छे. द्रव्य पर्यायमां अशुद्धपणे परिणमेलुं छे तेथी अशुद्धद्रव्य कह्युं छे. एटले प्रमाणनुं जे द्रव्य छे ते अशुद्ध छे. ते अशुद्ध द्रव्यार्थिकनयनो एटले पर्यायार्थिक नयनो विषय छे. तेने गौण करी व्यवहार कहे छे. (निश्चयनी द्रष्टिमां) व्यवहारनुं स्वरूप ज अभावरूप छे, अने निश्चयनुं स्वरूप भाव छे. एटले अशुद्धद्रव्यार्थिकनयने गौण करी, पेटामां राखी व्यवहार कह्यो छे. हवे व्यवहार उपरथी द्रष्टि हठावी लई, जे पुरुष पोतानी द्रष्टि, जिनवाणीमां