एटले हवे ते फरीने आवशे नही. आवो ज भाव गाथा ३८नी टीकाना अंतमां आवे छे. के -‘निज रसथी ज मोहने उखाडीने, फरी अंकुर न उपजे एवो नाश करीने, महान ज्ञानप्रकाश मने प्रगट थयो छे.’ प्रवचनसारनी गाथा ९२ नी टीकामां पण कह्युं छे के- ‘अने ते (बहिर्मोहद्रष्टि) तो आगमकौशल्य तथा आत्मज्ञान वडे हणाई गई होवाथी हवे मने फरीथी उत्पन्न थवानी नथी.’ एटले के आत्माना अंतर अभ्यास वडे जे मिथ्यात्वनो नाश थयो छे ते फरीथी थवानो नथी.
नियमसारमां आवे छे के बे नयोना आश्रये सर्वस्व कहेवानी जिनवाणीमां पद्धति छे. तेमां स्याद्वाद समजीने जे निश्चयमां रमे छे एटले के त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकभावनी द्रष्टि करी तेमां रमणता करे छे ते मिथ्यात्वनुं वमन करीने ‘उच्चैः परम ज्योतिः समयसारं’ आ अतिशयरूप परमज्योति प्रकाशमान समयसार एटले शुद्धात्माने‘सपदि ईक्षन्ते एव’ तरत देखे ज छे, एटले तेनो प्रत्यक्ष अनुभव करे छे. आनुं नाम सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान छे.
जेमां एकाग्र थतां प्रत्यक्षपणे वेदाय छे-जणाय छे ए शुद्धात्मा केवो छे? अनादि वस्तु छे, नवी नथी. पर्यायमां तो वेदन थतां भान थयुं पण वस्तु तो अनादिनी छे. ‘अनवम्’ एटले (ज्ञायकभाव) नवो उत्पन्न थयो नथी, अनादि छे. पहेलां कर्मथी आच्छादित हतो एटले के पर्यायबुद्धिथी रागादिनी रुचिनी आडमां ज्ञायकभाव ढंकाई गयो हतो ए प्रगट व्यक्तरूप थई गयोे. शक्तिरूपे-स्वभावरूपे तो हतो ज, पण पर्याय अने रागादिना प्रेममां ए जणातो न हतो ते शुद्ध चैतन्यघन स्वभावनी रुचि अने एकाग्रता थतां व्यक्तरूप प्रगट थई गयो, ज्ञानमां जणाई गयो. वळी केवो छे? ‘अनय–पक्षअक्षुण्णम’ एटले सर्वथा एकांतरूप कुनयना पक्षथी खंडित थतो नथी. वेदांतादि कहे छे के द्रव्य एकांत कूटस्थ छे, परिणमनशील नथी. तो केटलाक एकली पर्यायने ज माने छे. एटले जे एम माने छे के एकांत द्रव्य ज छे, पर्याय नथी तथा पर्याय छे, द्रव्य नथी ते बधा कुनयने माननारा छे. तेमना कुनयोथी वस्तु खंडित थती नथी, ते तो जेवी छे तेवी अक्षुण्ण रहे छे. कोई आत्माने सर्वव्यापी कहे, कोई शरीरव्यापी कहे, ईत्यादि एकांत कुनयो छे. परंतु ते सघळा कुनयोथी ते खंडित थतो नथी, ए तो निर्बाध छे.
जिनवचन एटले वीतरागदेवनी वाणी स्याद्वादरूप छे. स्यात् कहेतां कोई एक अपेक्षाए, वाद कहेतां कथन, जिनवचन जे अपेक्षाए होय ते अपेक्षा बराबर समजवी