Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७० [ समयसार प्रवचन

व्यवहार होय छे एवो स्याद्वादमतमां गुरुओनो उपदेश छे. व्यवहारने कथंचित् असत्यार्थ कह्यो पण ते मार्गमां आव्या विना रहेतो नथी; तेम व्यवहारथी निश्चय थाय एम पण नथी. आवो गुरुओनो उपदेश छे ते यथार्थ अवधारवो.

हवे ए अर्थनुं (चोथा) कळशरूप काव्य टीकाकार कहे छेः

* कळश –४ श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘उभयनयविरोधध्वंसिनि’- निश्चय अने व्यवहार ए बे नयने विषयना भेदथी परस्पर विरोध छे. निश्चयनयनो विषय अभेद छे, व्यवहारनयनो विषय भेद छे. बे विरुद्ध थया ने? निश्चयनय पूर्णानंदस्वरूप एक अखंड अभेद आत्माने विषय बनावे छे, अने व्यवहारनय वर्तमान पर्याय, राग आदि भेदने विषय बनावे छे. आम बन्नेना विषयमां फेर छे. निश्चयनो विषय द्रव्य छे, व्यवहारनो विषय पर्याय छे. एटले बे नयोने परस्पर विरोध छे. आ नयोना विरोधने नाश करनार ‘स्यात्पदांके’ -एटले स्यात्पदथी चिह्नित जिनवचन छे. ‘स्यात्’ एटले कथंचित् अर्थात् कोई एक अपेक्षाए. जिनवचनमां प्रयोजनवश द्रव्यार्थिकनयने मुख्य करीने एने निश्चय कहे छे. अने पर्यायार्थिक वा अशुद्धद्रव्यार्थिकनयने गौण करीने व्यवहार कहे छे. पर्याय जे अशुद्धता छे ते द्रव्यनी ज अशुद्धता छे तेथी पर्यायार्थिकनयने अशुद्धद्रव्यार्थिक कह्यो छे. जुओ, त्रिकाळ, ध्रुव अखंड एक ज्ञायकभावने मुख्य करी निश्चय कहीने सत्यार्थ कहे छे अने पर्यायने गौण करीने व्यवहार कही असत्यार्थ कहे छे. आम, जिनवचन स्यात्पद वडे बन्ने नयोना विरोध मटाडे छे.

कळशटीकाकारे अर्थ कर्यो छे के - जिनवाणीमां -दिव्यध्वनिमां त्रिकाळ शुद्ध जीववस्तु चैतन्यमूर्ति उपादेय कही छे. एमां स्यात्पद आवी जाय छे. आवा स्याद्वादमुद्रित जिनवचनमां जे पुरुषो रमे छेः ‘जिनवचसि रमन्ते ये’ अहीं जिनवचनमां रमवुं एनो अर्थ एम छे के जिनवाणीमां जे शुद्ध जीववस्तु ज्ञायकभाव उपादेय कह्यो छे तेमां सावधानपणे एकाग्र थवुं, ते ज्ञायकभावनुं प्रत्यक्ष वेदन करवुं. जीवने रागनुं अने विकारनुं वेदन तो अनादिथी छे अने ते वडे ए दुःखी छे. हवे ए दुःखथी छोडाववा विकारनी -रागनी पर्यायने गौणकरी एटले एना परथी लक्ष हठावी लई भगवान आत्मा सच्चिदानंद, एक, अखंड, जे ज्ञायकभाव तेमां द्रष्टि करी, तेनो प्रत्यक्ष अनुभव करवो, तेमां एकाग्रता अने स्थिरता करवी. आ ज सुखनो मार्ग छे. एटले जे पुरुषो जिनवचनमां रमे छे अर्थात् शुद्ध एक ज्ञायकभावने उपादेय करी प्रचुर प्रीति सहित तेमां एकाग्रतानो वारंवार अभ्यास करे छे, ‘ते स्वयं वांतमोहः’ अहाहा! ते पुरुषो पोतानी मेळे, अन्य कारण विना मिथ्यात्वकर्मनुं वमन करे छे. तेमने मिथ्यात्वभाव रहेतो नथी, ऊडी जाय छे.