वचन-कायाना शुभयोगरूप प्रवृत्ति होय छे. अरहंतादि पंचपरमेष्ठीना ध्यानरूप प्रवर्तन तथा ए रीते प्रवर्तनाराओनी संगतिनो शुभभाव होय छे.
तथा विशेष जाणवा माटे शास्त्रोना अभ्यास करवानो पण भाव होय छे. कळशटीकामां १३ मा कळशमां कह्युं छे के -“कोई जाणशे के द्वादशांगज्ञान कोई अपूर्व लब्धि छे. तेनुं समाधान आम छे के द्वादशांगज्ञान पण विकल्प छे. तेमां पण एम कह्युं छे के शुद्धात्मानुभूति मोक्षमार्ग छे. तेथी शुद्धात्मानुभूति थतां शास्त्र भणवानी कांई अटक (बंधन) नथी.” सांभळवानो, वांचवानो, शास्त्रना अभ्यासनो, उपदेश आदिनो विकल्प आवे, पण ते वडे शुद्धता वधे छे एम नथी. आ शुभभावो आवे छे एम प्रवर्तवुं एनो अर्थ ए के एने यथास्थित जाणवा. आठमी गाथामां आवे छे के -ज्यारे व्यवहार-परमार्थना मार्ग पर सम्यग्ज्ञानरूपी महारथने चलावनार सारथी समान अन्य कोई आचार्य अथवा तो ‘आत्मा’ शब्द कहेनार पोते ज व्यवहारमार्गमां रहीने “दर्शन-ज्ञान-चारित्रने जे हंमेशा प्राप्त होय ते आत्मा छे” एम भेद पाडीने समजावे छे. व्यवहारमां आवीने समजावे छे के दर्शन-ज्ञान- चारित्रने हंमेशा प्राप्त होय ते आत्मा. आवो व्यवहारनो उपदेश अंगीकार करवो प्रयोजनवान छे. पण व्यवहारनयना उपदेशमां एम न समजवुं के आत्मा परद्रव्यनी क्रिया करी शके छे. वळी एम पण न समजवुं के शुभभाव करवाथी आत्मा शुद्धताने पामे छे. परंतु एम समजवुं के साधकनी अवस्थामां भूमिकानुसार आवा शुभभावो आव्या विना रहेता नथी.
व्यवहारनयने कंथचित् असत्यार्थ कहेवामां आव्यो छे. ११ मी गाथामां व्यवहारने अभूतार्थ-असत्यार्थ कह्यो छे ने? ए तो गौण करीने असत्यार्थ कह्यो छे. शुं शुभभाव आदि नथी? छे. अहीं असद्भूत व्यवहारनी वात छे. तेने असत्यार्थ कह्यो छे तेथी कोई तेने सर्वथा असत्यार्थ मानीने छोडी दे, शुभोपयोगरूप व्यवहारने जूठो जाणीने छोडी दे, अने शुद्धोपयोगनी साक्षात् प्राप्ति तो थई नथी, तेथी तो पोते अशुभोपयोगमां आवी जशे, नीचे ऊतरी जशे. हिंसा, जूठ आदि तथा भोग आदि अशुभमां भ्रष्ट थई गमे तेम स्वच्छंदे प्रवर्तशे तो नरकादि गतिने अने परंपराए निगोदने प्राप्त थई संसारमां ज परिभ्रमण करशे. शुद्धोपयोगनी प्राप्ति थाय अने व्यवहारने छोडे ए तो बराबर छे. खरेखर तो शुद्धोपयोगरूप वीतरागदशा थई जाय त्यां व्यवहार स्वयं छूटी जाय छे, छोडवो पडतो नथी.
ज्यां सुधी शुद्धनयनो आश्रय रहे छे त्यां सुधी पूर्णतानी प्राप्ति नथी एटले के केवळज्ञान नथी. त्यां सुधी व्यवहार आवे ते जाणेलो प्रयोजनवान छे. नीचली दशामां आवो