Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६८ [ समयसार प्रवचन

संसारी उखाडी नाखे, भवना अंत आवे अने मोक्षनी तैयारी थाय एनी वात चाले छे. जिनवचन, जिनगुरु प्रत्ये जे लक्ष थाय छे ए तो राग छे, ए कांई समकित नथी. छतां समकित थतां पहेलां आवो ज व्यवहार होय छे. वळी जिनबिंबना दर्शननो पण भाव होय छे. समोसरणमां वीतराग अरिहंत परमात्मा होय छे. एवी ज वीतरागी मूर्ति होय एने जिनबिंब कहीए. अन्य आभूषणादियुक्त मूर्ति ते जिनबिंब नथी. भगवान तो नग्न-दिगंबर वीतरागस्वरूप होय छे. तेवी ज नग्न-दिगंबर वीतरागी मूर्ति ते जिनबिंब छे. आवा जिनबिंबना दर्शन, भक्ति, पूजा ईत्यादि बाह्य व्यवहार प्रवर्तननो भाव समकित थया पहेलां होय छे पण एनाथी निश्चय समकित थाय नहीं. निश्चय सम्यक्त्व तो एकमात्र अखंड एक ज्ञायकभावनुं अवलंबन थतां ज थाय छे. व्यवहारमार्गमां प्रवृत्त थवुं प्रयोजनवान छे एम कह्युं त्यां ते शुभभावोनी प्रवृत्तिथी सम्यग्दर्शननो लाभ थाय छे एम आशय नथी पण सम्यग्दर्शन थतां पहेलां आवा शुभभावो होय छे एम सिद्ध कर्युं छे. हवे जेमने श्रद्धा-ज्ञान तो थयां छे, पण साक्षात् प्राप्ति थई नथी एवा जीवने पूर्वकथित भावो जेवा के जिनवचनो सांभळवां, धारवां, गुरुभक्ति, जिनबिंबदर्शन ईत्यादि होय छे. खरेखर तो सम्यग्दर्शन थया पछी ज उक्त भावो व्यवहार नामने पामे छे. सम्यग्द्रष्टिने ज साचा नय-निक्षेप होय छे. अज्ञानी मिथ्याद्रष्टिने नय-निक्षेप होता नथी. अज्ञानीना शुभभावो तो व्यवहाराभास छे. अहीं कहे छे के सम्यग्दर्शन थया पछी ज्यांसुधी पूर्णतानी प्राप्ति न थाय त्यांसुधी आवा भावो होय छे; पण आवा भावोथी निश्चय पामे-एम नथी. आ तो आवा शुभ विकल्पो होय छे तेम दर्शाववुं छे. वळी परद्रव्यनुं आलंबन छोडवारूप अणुव्रत-महाव्रतनुं ग्रहण, समिति, गुप्ति, पंचपरमेष्ठीना ध्यानरूप प्रवर्तन, अने ए रीते प्रवर्तनाराओनी संगति करवी ईत्यादि भावो होय छे. अहीं आलंबन छोडवा माटे एम कह्युं छे. परद्रव्य तो छूटा पडया छे, छोडवाना क्यां छे? परद्रव्यनुं आलंबन छोडवा माटे एटले तेना तरफनुं लक्ष छोडवा माटे एम समजवुं. तीव्र कषायना भावनी निवृत्ति अर्थे आवा अणुव्रत-महाव्रतादिना शुभ विकल्प होय छे. परद्रव्यनुं ग्रहवुं अने छोडवुं ए तो आत्माने छे ज नहीं. खरेखर तो आत्माए रागनो नाश कर्यो एक कहेवुं ए पण कथनना मात्र छे. रागनो नाश करवो ए एना स्वरूपमां छे ज नहीं. ए स्वरूपमां स्थिर थई जाय छे त्यारे राग उत्पन्न थतो नथी. एने रागनो नाश र्क्यो एम व्यवहारथी कहेवाय छे. जोईने चालवुं, विचारीने बोलवुं, निर्दोष आहार लेवो ईत्यादि शुभ विकल्पनो- ईर्योभाषाएषणा आदि समितिना पालननो व्यवहार होय छे. अशुभथी बचवा मन-