पकडीने रमे एटले तेमां एकाग्रता करे एम वात कही छे. पर्याय, राग के निमित्त ते उपादेय नथी. वळी जिनवचनो तो निश्चय अने व्यवहार बन्ने छे. बन्ने मां रमवुं ते शुं? तो कहे छे बंने उपादेय होई शके ज नही. पण दिव्यध्वनि ए जे शुद्ध जीव वस्तुने उपादेय कही छे तेमां सावधानपणे रुचि-श्रद्धा-प्रतीति करे-प्रत्यक्ष अनुभव करे तेने जिनवचनमां रमवुं कहे छे.
वळी केवुं छे जिनवचन? तो निश्चय अने व्यवहार बंनेना विरोधने मटाडनारुं छे. निश्चय अने व्यवहार बन्ने जिनवचनो छे. परंतु निश्चय अने व्यवहारने परस्पर विषयनो विरोध छे. तथा निश्चयनुं फळ मोक्ष अने व्यवहारनुं फळ संसार छे. हस्तावलंब जाणी जिनवचनमां व्यवहारनो घणो उपदेश छे, पण तेनुं फळ संसार कह्युं छे. तो बंनेमां रमे शी रीते? जिनवचनमां प्रयोजनवश व्यवहारने गौण करी तथा निश्चयने मुख्य करी शुद्ध जीव वस्तु उपादेय कही छे. ते एकमां ज एकाग्र थवुं एने रमवुं एम कह्युं छे अने ते ज यथार्थ उपदेश छे.
हवे कहे छे-ए जिनवचनो सांभळीने धारण करवां, धारी राखवां, एक कानथी सांभळी बीजा काने काढी नाखवां एम नहीं. १४मी गाथामां आवे छे के आत्मा अबद्ध, अस्पृष्ट, आदि पांच भाववाळो छे; त्यां शिष्य पूछे छे के -‘आ अबद्ध, अस्पृष्ट आदि भाववाळा आत्मानो अनुभव केम थई शके? आनो अर्थ एम के शिष्ये प्रथम धारी राख्युं हतुं के आत्मा अबद्ध अपृस्ष्ट आदि स्वभाववाळो छे तथा एने ओळखी अनुभव करतां जिनशासन छे. तेथी तो एने प्रश्न थयो के आवा आत्मानो अनुभव केम थई शके? त्यां आचार्येखुलासो कर्यो छे के भाई! राग छे, पुण्य छे, पर्याय छे. पण ए बद्ध-स्पृष्टादि भावो अभूतार्थ छे, कायम रहे एवी चीज नथी तेथी अनुभव थई शके छे. आम जिज्ञासु पात्र जीव समकित थता पहेलां उपदेश बराबर धारी राखतो होय छे तेनी अहीं वात करी छे.
आगळ कहे छे- तथा जिनवचनोने कहेनारा श्री जिनगुरुनी भक्ति, जिनबिंबनां दर्शन ईत्यादि व्यवहारमार्गमां प्रवृत्त थवुं प्रयोजनवान छे. अहीं जिनवचनोने कहेनार जिनगुरुनी भक्ति वगेरेनो भाव समकित थया पहेलां आवे छे एनी वात करी छे. पण भक्ति करे तेथी समकित थाय एम नथी. भक्तिना फळमां सम्यग्दर्शन थाय के नहीं? ना. समवसरणमां त्रणलोकना नाथ बिराजमान होय छे, तेमनी भक्ति अनंतवार करी. अरे! एनी भक्तिना भावथी सम्यक्त्व न पमाय ए तो ठीक, एनी भक्तिने जाणनार ज्ञाननो जे सूक्ष्म अंश छे तेना आश्रये पण समकित न थाय. प्रभु! आ तो आखो