कह्युं, पण ते सांभळवामात्रथी ज सम्यग्दर्शन थाय छे एम नथी. ११ मी गाथामां एम कह्युं के भूतार्थना आश्रये एटले त्रिकाळी ध्रुव निज ज्ञायकभावना आश्रये सम्यग्दर्शनादि धर्म थाय छे, सांभळवाथी नहीं, निमित्तथी नहीं. अरेरे! क्षणे क्षणे निमित्तना अने रागना प्रेममां आ अनाकुळस्वभावी आत्मानो आनंद लूंटाई जाय छे!
मोक्षमार्गप्रकाशकना आठमा अधिकारमां आवे छे के -‘हवे मिथ्याद्रष्टि जीवोनेे मोक्षमार्गनो उपदेश आपी तेमनो उपकार करवो ए ज उत्तम उपकार छे श्री तीर्थंकरगणधरादि पण एवो ज उपकार करे छे, माटे आ शास्त्रमां पण तेमना ज उपदेशानुसार उपदेश आपीए छीए.’ एक बाजु एम कहे के कोई, कोई अन्यनो उपकार करी शकतुं नथी अने अहीं मोक्षमार्गनो उपदेश आपी उपकार करवानुं कह्युं छे ते केवी रीते छे? अरे भाई! आ तो निमित्तनी अपेक्षाथी कथन छे. ज्यारे यथायोग्य निमित्तनुं ज्ञान कराववुं होय त्यारे आवा कथनो आवे छे. जेम हरणनी नाभिमां कस्तुरी छे एनी एने किंमत नथी. एम भगवान आत्मा आनंदनुं दळ छे. पोताना अनंत सामर्थ्यनी अज्ञानीने किंमत नथी. एनी शक्तिओ एटले गुणो-ज्ञान, दर्शन, आनंद, शांति, स्वच्छता वगेरे छे. आ शक्तिओनुं माप नथी. जे स्वभाव होय एनुं माप शुं? अमाप ज्ञान, अमाप दर्शन, अमाप स्वच्छता एम अनंत शक्तिओ भरेली छे. पोते पूर्ण ईश्वर छे. आवो भगवान पूर्ण आनंदस्वरूप छे. एमां जाने! एमां प्रवेशी ऊंडो ऊतरी जाने! सम्यग्दर्शन पामता पहेलां आवो एनो व्यवहार (भाव) होय छे. निश्चय प्रगटे तेने ए व्यवहार कहेवाय छे, अन्यथा नहीं. त्रिकाळी, ध्रुव द्रव्यना आश्रये धर्म प्रगट थाय छे एवां जिनवचन ते सांभळे छे. सांभळवाथी समकित थाय एम नहीं पण समकितसन्मुख जीवने आवा ज जिनवचनना उपदेशनुं निमित्त होय छे. अहा! जीव पोते मिथ्याश्रद्धान वडे अनंत अनंत जन्म मरण करी अनादिथी संसारमां परिभ्रमण करी कह्यो छे. कषायनी मंदताथी धर्म थाय, निमित्त सारुं होय तो पोतानुं कार्य थाय, ज्ञाननो क्षयोपशम विशेष होय तो आत्मदर्शन थाय वगेरे अनेक शल्यो संसार वधवाना कारण छे. ए सघळा मिथ्याश्रद्धानने दूर करी जन्म-मरणनो अंत करावनारां जिनवचनो ते जेमनाथी यथार्थ उपदेश मळे तेमनी पासे बराबर सांभळे छे.
आगळ कळश ४ मां आवे छे के -‘जिनवचसि रमन्ते,’ आवो अर्थ कळश टीकाकारे कर्यो छे के- भाई! वाणी तो जड पुद्गल छे. ते जडमां रमवुं ते शुं? तो जिनवचनमां तो भगवान पूर्णानंदनो नाथ त्रिकाळी शुद्ध जीव वस्तु उपादेय कही छे तेने