सम्यग्दर्शन प्रगटयुं ते आत्मानुं ज परिणाम छे, आत्माथी भिन्न नथी तेथी आत्मा ज छे, अन्य कांई नथी.
हवे झीणो न्याय आवे छे. वस्तुनुं जेवुं स्वरूप छे तेम ज्ञानने दोरी जवुं ते न्याय छे. आ तो सर्वज्ञभगवाने कहेला न्याय छे.
अहीं एटलुं विशेष जाणवुं के-नय छे ते श्रुतप्रमाणनो अंश छे, तेथी शुद्धनय पण श्रुतप्रमाणनो ज अंश थयो. श्रुतप्रमाण एटले? जे ज्ञाननी पर्याय द्रव्य-गुण-पर्याय बधाने जाणे ते श्रुतज्ञानप्रमाण कहेवाय. ए प्रमाणनो एक भाग शुद्धनय छे. ते त्रिकाळी शुद्ध ध्रुव आत्माने जुए छे. तेनो बीजो भाग व्यवहारनय छे. ते वर्तमान पर्याय, रागादिने जाणे छे. जे ध्रुव, नित्यानंद ज्ञायकभाव तेने जोनार श्रुतज्ञानना अंशने शुद्धनय कहे छे. ए नय एकला शुद्ध त्रिकाळीने जुए छे तेथी शुद्धनय कहेवाय छे.
हवे श्रुतप्रमाण छे ते परोक्ष प्रमाण छे. एमां आत्मा प्रत्यक्ष न देखाय. जेम केवळज्ञानमां आत्मा प्रत्यक्ष जणाय एम श्रुतज्ञानमां प्रत्यक्ष न जणाय. श्रुतज्ञान परोक्ष प्रमाण छे कारण के त्यां वस्तुने सर्वज्ञना आगमना वचनथी जाणी छे. वस्तु जे छे भगवान आत्मा ए तो अरूपी छे, तेमां रूप, रस, गंध, वर्ण नथी. ते तो अनंत गुणोनो पिंड चैतन्यघन अरूपी छे. ए वस्तुने सर्वज्ञना आगमना वचनथी जाणी छे. पांचमी गाथामां आव्युं हतुं ने के आगमनी उपासनाथी निजविभव प्रगटयो छे. एटले आगमना वचनोथी आत्मा पूर्ण शुद्ध वस्तु जाणी छे. त्यां आगम कोने कहेवुं? के जे त्रिकाळी आत्मा आनंदनो नाथ प्रभु प्रगट सर्वज्ञदशाने प्राप्त छे एनी जे ॐकार दिव्यध्वनि नीकळी तेने आगम कहे छे. अज्ञानीए कहेलां होय ते आगम नहीं. सर्वज्ञनी वाणीने शास्त्र अथवा परमागम कहेवाय छे. वस्तु प्रत्यक्ष जोईने जाणेली नथी परंतु सर्वज्ञना आगमथी जाणी छे के आ ज्ञायक पूर्ण छे ते आ छे. श्रुतज्ञान परोक्ष केम छे ते सिद्ध करे छे. सर्वज्ञना आगमथी लक्षमां आव्युं के वस्तु अखंड आनंदरूप पूर्ण चैतन्यरूप छे. श्रीमदे कह्युं छे ने? ‘लक्ष थवाने तेहनुं, कह्यां शास्त्र सुखदायी’ गुरु पण सर्वज्ञनी वाणी अनुसार शास्त्र कहे छे.
नय छे ते श्रुतप्रमाणनो अंश छे. तेथी शुद्धनय पण श्रुतप्रमाणनो अंश थयो. श्रुतप्रमाण ते परोक्ष प्रमाण छे. तेथी आ शुद्धनय, सर्व द्रव्योथी जुदा, आत्मानी सर्व पर्यायोमां व्याप्त, पूर्ण चैतन्य केवळज्ञानरूप-सर्व लोकालोकने जाणनार, असाधारण चैतन्यधर्मने परोक्ष देखाडे छे. अहीं केवळज्ञान एटले व्यक्त पर्याय नहीं पण एकलुं ज्ञान, ज्ञान, त्रिकाळ ध्रुव ज्ञान समजवुं. जेम आत्मा त्रिकाळध्रुव छे एम एनो ज्ञानगुण