त्रिकाळध्रुव केवळज्ञानरूप छे. ए गुण मति, श्रुत, अवधि आदि सर्व पर्यायोमां व्याप्त होय छे. पूरा द्रव्यमां अने तेनी बधी पर्यायोमां व्याप्त होय एवुं ज गुणनुं स्वरूप छे. जेम साकरनो मीठाश गुण साकरना पूरा भागमां व्याप्त छे तेम ज्ञानगुण आत्माना पूरा द्रव्यमां अने तेनी सर्व पर्यायोमां व्याप्त छे, अने ते लोकालोकने जाणवाना स्वभावरूप छे. आ तो ज्ञानगुण केवडो छे तेना अनंत महिमानी वात छे. अहीं कहे छे- शुद्धनय, सर्व द्रव्योथी जुदा, आत्मानी सर्व पर्यायोमां व्याप्त, लोकालोकने जाणवानो जेनो स्वभाव छे एवा पूर्ण चैतन्य केवळज्ञानरूप असाधारण (अन्य द्रव्योमां न होय तेवा) चैतन्यधर्मने परोक्ष देखाडे छे. एटले शुद्धनयनी द्रष्टि वडे जे त्रिकाळ ध्रुव चैतन्यपूर्ण ने देखे छे, श्रद्धे छे तेने साचुं सम्यग्दर्शन छे.
व्यवहारी छद्मस्थ जीव आगमने प्रमाण करी, वाणी सत् छे एने लक्षमां लई, वाणीनुं जे वाच्य त्रिकाळ ध्रुव ज्ञायकभाव तेनुं श्रद्धान करे ए निश्चय सम्यग्दर्शन छे. ए सुखनी प्रथम कणिका छे. बाकी बधा दुःखना पंथे चढेला छे. शास्त्रोने जाणनारा ज्यांसुधी ज्ञायकनी द्रष्टि न करे त्यांसुधी दुःखना पंथमां छे मार्ग तो आ छे, भाई!
ज्यांसुधी केवळ व्यवहारनयना विषयभूत जीवादि भेदरूप तत्त्वोनुं ज श्रद्धान रहे, त्यांसुधी निश्चय सम्यग्दर्शन नथी. तेथी आचार्य कहे छे के ए नवतत्त्वोनी परिपाटीने छोडी, नयना भेदो तथा पर्यायना भेदोनुं लक्ष छोडी, शुद्धनयना विषयभूत एक अखंड ज्ञायक आत्मा ज अमने प्राप्त थाओ; बीजुं कांई चाहता नथी. आ वीतराग अवस्थानी प्रार्थना छे. पर्यायो नथी एम नथी, पण ते गौण करी तेमनुं लक्ष छोडवानी वात छे. जो पर्याय नथी एम मानवा जशे तो मिथ्यात्व थशे. आ कोई नयपक्ष नथी. जो सर्वथा नयोनो पक्षपात ज थया करे तो मिथ्यात्व ज छे.
अहीं कोई प्रश्न करे के- आत्मा चैतन्य छे, जाणन, जाणनस्वभावी छे. आटलुं चैतन्यरूप ज ज्ञानमां अनुभवमां आवे तो एटली श्रद्धा ते सम्यग्दर्शन छे के नहीं? आवी श्रद्धावाळाने आखो आत्मा हाथ लाग्यो एम कहेवाय के नही?
समाधानः– आत्माने चैतन्यमात्र तो नास्तिक सिवाय सर्व मतवाळाओ माने छे. एम चार्वाक मत चैतन्यने मानतो नथी. बीजा बधा आत्मा चैतन्यरूप छे एम तो माने छे. जो आटली श्रद्धाने सम्यग्दर्शन कहेवामां आवे तो उपर कहेला बधाने सम्यग्दर्शन सिद्ध थई जशे. जाणनार, जाणनार एम नास्तिक सिवाय तो घणा आत्माने माने छे, तो ते बधाने सम्यक्त्व सिद्ध थशे. पण एम नथी. आत्मा तो सर्वज्ञ स्वभावी छे. सर्वज्ञ स्वभाव एटले पोताना अनंतगुणो, तेनी अनंत पर्यायो, अने बधा परने (लोकालोकने)