जाणे एवी एनी शक्ति छे. एवी सर्वज्ञशक्ति जेमने प्रगट थई छे एवा सर्वज्ञ भगवाने जेवो पूर्ण आत्मा जोयो तेवा पूर्ण आत्मानुं स्वरूप तेमनी ॐकार दिव्यध्वनिमां आव्युं. ते आत्मा केवो छे? तो पूर्णज्ञानघन छे. अहीं पूर्ण शब्द सूचक छे. पूर्ण एटले त्रणकाळ त्रणलोकना द्रव्य-गुण-पर्यायो जाणवानो एनो स्वभाव छे. एवुं जे शरीरादिथी भिन्न पूर्णज्ञानघन आत्मानुं स्वरूप छे तेनी द्रष्टिपूर्वक श्रद्धान थतां सम्यग्दर्शन थाय छे. आवुं सम्यग्दर्शन जीवे अनादिथी अनंतकाळमां प्रगट कर्युं नथी तेथी तेने चार-गतिमां मात्र रखडवानुं ज थयुं छे.
एथी अहीं कहे छे के भगवान आत्मानुं कोई अद्भूत स्वरूप छे. तेनुं पूर्णज्ञान, पूर्णआनंद, पूर्ण ऐश्वर्य, पूर्ण स्वच्छता, पूर्ण प्रकाश आदि अनेक (अनंत) पूर्ण शक्तिओथी भरेलुं चमत्कारिक परिपूर्ण स्वरूप छे. एनी शांतिनी पर्यायने करे एवा कर्ता गुणथी पूर्ण छे, एनुं जे कार्य आनंद आदि थाय एवी कर्मशक्तिथी पूर्ण छे, जे साधन थईने निर्मळदशा प्रगट थाय एवा साधनगुणथी पूर्ण छे, जे निर्मळता आदि प्रगटे ते पोते राखे एवी संप्रदानशक्तिथी पूर्ण छे, ईत्यादि. सर्वज्ञ भगवाननी वाणीमां आत्मानुं आवुं परिपूर्ण चैतन्यघन स्वरूप कह्युं छे. एनुं यथार्थ श्रद्धान थवाथी ज सम्यग्दर्शन थाय छे, त्यारे ज धर्मना पंथनी ओळखाण थाय छे.
हवे (७मा कळशमां) शुद्धनयने आधीन एटले आत्माना पूर्णस्वरूपने जोनारी जे द्रष्टि तेने आधीन भगवान आत्मा प्रगट थाय छे. केवो छे ते आत्मा? समस्त परद्रव्योथी भिन्न, झळहळ आत्मज्योति स्वरूप छे, ते प्रगट थाय छे.
‘अतः’ त्यारबाद ‘शुद्धनय–आयत्तं’ शुद्धनयने आधीन, पवित्र द्रष्टिने आधीन ‘प्रत्यग्–ज्योतिः’ जे भिन्न आत्मज्योति छे ‘तत्’ ते ‘चकास्ति’ प्रगट थाय छे. शुद्धनयने आधीन भिन्न आत्मज्योति अनुभवमां आवे छे.
केवी छे ते आत्मज्योति? ‘नव–तत्त्व–गतत्वे अपि’ के जे नवतत्त्वमां प्राप्त थवा छतां-जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा अने मोक्ष एम नवतत्त्वमां व्याप्त होवा छतां- ‘एकत्वं’ पोताना एकपणाने ‘न मुञ्चति’ छोडती नथी. नवमां रहेली देखाती होवा छतां पोताना शुद्धज्ञायकभावपणे एकपणे ज रहे छे.
जेम काशीघाटनो लोटो होय अने तेमां पाणी भर्युं होय तो लोटा जेवो पाणीनो आकार देखाय छे, छतां लोटाना अने पाणीना पोतपोताना आकारो तद्न भिन्न