छे. तेम चिदानंदज्योति, ज्ञानजळ भगवान आत्मा, ज्ञान जेनो आकार छे एवो आत्मा देहदेवळमां रहेलो छे. ते देहाकार होवा छतां देहना आकारथी तद्न जुदो छे. शरीर तो पुद्गलाकार छे, भगवान आत्मा चैतन्य-आकार छे. बंने जुदे-जुदा छे.
आत्मानी एके-एक शक्ति परिपूर्ण छे. एवी अनंत शक्तिओनो पिंड आत्मवस्तु परिपूर्ण एकस्वरूप छे. ते नवतत्त्वोमां रहेलो देखातो होवा छतां पोतानुं एकपणुं छोडतो नथी. ज्ञायक छे ते रागमां छे, द्वेषमां छे एम देखाय, शुद्धताना अंशमां देखाय, शुद्धतानी वृद्धि थाय एमां देखाय छतां ज्ञानक चैतन्यज्योति पोतानुं एकपणुं छोडती नथी. जेम अग्नि लाकडुं; छाणुं ईत्यादि आकारे भेदपणे परिणमेलो देखाय छतां अग्नि पोतानुं अग्निपणुं-उष्णपणुं छोडतो नथी, ते उष्णपणे ज कायम रहे छे. तेम भगवान आत्मा नवतत्त्वमां भेदरूप थयेलो देखाय छतां ते ज्ञायकपणाने छोडतो नथी, ज्ञायक, ज्ञायक ज्ञायक एक ज्ञायकसामान्य एकपणे ज रहे छे.
भाई! आ आत्मा क्यां अने केवडो छे ए तें जोयो नथी. ए तो पोतामां परिपूर्ण वस्तु छे. साकर अने सेकेरीन बन्नेमां मीठाश छे. पण साकरना बहु मोटा गांगडा करतां पण बहु अल्पप्रमाण सेकेरीनमां अनेकगणी मीठाश छे. तेथी वस्तुनुं कद मोटुं होय तो शक्ति वधारे एम नथी. भगवान आत्मा शरीरप्रमाण (शरीरपणे नहीं) होवा छतां पोताना ज्ञान, दर्शन आदि सामर्थ्यथी परिपूर्ण छे. अनेक अवस्थाओमां व्याप्त ते चैतन्यसामान्य एकमात्र चैतन्यपणे ज रहे छे. ए निर्मळानंद भगवान आत्मानी प्रसिद्धि करवी होय तो एना एकपणानी-सामान्यस्वभावनी द्रष्टि करवी जोईए. त्यारे ज तेनी साची प्रतीति अने साक्षात्कार थाय छे, तेने सम्यग्दर्शन कहे छे.
नवतत्त्वमां प्राप्त थयेलो आत्मा अनेकरूप देखाय छे; जो तेनुं भिन्न स्वरूप विचारवामां आवे तो ते पोतानी चैतन्य-चमत्कारमात्र ज्योतिने छोडतो नथी. जेम अग्निने छाणानो अग्नि, लाकडानो अग्नि एम कहेवाय, पण अग्नि तो अग्निपणे छे. भिन्न भिन्न ईंधनना आकारे अग्नि थयेलो होय एम भले देखाय पण ए अग्निनो ज आकार छे, लाकडा के छाणा वगेरे ईंधननो नथी. तेम आत्मा ज्ञायकस्वरूप परने जाणवा काळे अजीवने जाणे, रागने जाणे, द्वेषने जाणे, शरीरने जाणे. त्यां जाणपणे जे परिणमे ते पोते परिणमे छे, ज्ञानस्वरूप कायम रहीने परिणमे छे. परपणे- अजीवपणे, रागपणे, द्वेषपणे, शरीरपणे थईने जाणतो नथी. ज्ञान परपणे थइने परिणमे छे एम नथी, ज्ञान