Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 193 of 4199

 

१८६ [ समयसार प्रवचन

करनार-ए बन्ने आस्रव छे, संवररूप थया योग्य (संवार्य) अने संवर करनार- (संवारक)-ए बन्ने संवर छे, निर्जरवा योग्य अने निर्जरा करनार-ए बन्ने निर्जरा छे, बंधावा योग्य अने बंधन करनार-ए बन्ने बंध छे अने मोक्ष थवा योग्य अने मोक्ष करनार-ए बन्ने मोक्ष छे; कारणके एकने ज पोतानी मेळे पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्षनी उपपत्ति (सिद्धि) बनती नथी. ते बन्ने जीव अने अजीव छे (अर्थात् ते बब्बेमां एक जीव छे ने बीजुं अजीव छे).

बाह्य (स्थूल) द्रष्टिथी जोईए तोः-जीव-पुद्गलना अनादि बंधपर्यायनी समीप जईने एकपणे अनुभव करतां आ नव तत्त्वो भूतार्थ छे, सत्यार्थ छे, अने एक जीवद्रव्यना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां तेओ अभूतार्थ छे, असत्यार्थ छे; (जीवना एकाकार स्वरूपमां तेओ नथी;) तेथी आ नव तत्त्वोमां भूतार्थनयथी एक जीव ज प्रकाशमान छे. एवी रीते अंतर्द्रष्टिथी जोईए तोः- ज्ञायक भाव जीव छे अने जीवना विकारनो हेतु अजीव छे; वळी पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष-ए जेमनां लक्षण छे एवा तो केवळ जीवना विकारो छे अने पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष-ए विकारहेतुओ केवळ अजीव छे. आवां आ नव तत्त्वो, जीवद्रव्यना स्वभावने छोडीने, पोते अने पर जेमनां कारण छे एवा एक द्रव्यना पर्यायोपणे अनुभव करवामां आवतां भूतार्थ छे अने सर्व काळे अस्खलित एक जीवद्रव्यना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करवामां आवतां तेओ अभूतार्थ छे, असत्यार्थ छे. तेथी आ नवे तत्त्वोमां भूतार्थनयथी एक जीव ज प्रकाशमान छे. एम ते, एकपणे प्रकाशतो, शुद्धनयपणे अनुभवाय छे. अने जे आ अनुभूति ते आत्मख्याति (आत्मानी ओळखाण) ज छे, ने आत्मख्याति ते सम्यग्दर्शन ज छे. आ रीते आ सर्व कथन निर्दोष छे-बाधारहित छे.

भावार्थः– आ नव तत्त्वोमां, शुद्धनय जोईए तो, जीव ज एक चैतन्य- चमत्कारमात्र प्रकाशरूप प्रगट थई रह्यो छे, ते सिवाय जुदां जुदां नव तत्त्वो कांई देखातां नथी. ज्यां सुधी आ रीते जीवतत्त्वनुं जाणपणुं जीवने नथी त्यां सुधी ते व्यवहारद्रष्टि छे, जुदां जुदां नव तत्त्वोने माने छे. जीव-पुद्गलना बंधपर्यायरूप द्रष्टिथी आ पदार्थो जुदा जुदा देखाय छे; पण ज्यारे शुद्धनयथी जीव-पुद्गलनुं निजस्वरूप जुदुं जुदुं जोवामां आवे त्यारे ए पुण्य, पाप आदि सात तत्त्वो कांई पण वस्तु नथी; निमित्त-नैमित्तिक भावथी थयां हतां ते निमित्त-नैमित्तिक भाव ज्यारे मटी गयो त्यारे जीव-पुद्गल जुदां जुदां होवाथी बीजी कोई वस्तु (पदार्थ) सिद्ध थई शकती नथी. वस्तु तो द्रव्य छे ने द्रव्यनो निजभाव द्रव्यनी साथे ज रहे छे तथा निमित्त-नैमित्तिक भावनो तो अभाव ज थाय छे, माटे शुद्धनयथी