ज्ञायकभावने ज्ञायक, ज्ञायक...ज्ञायकसामान्यपणे जाणवो एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे एम सूत्रकार गाथा (१३) मां कहे छे.
त्रिकाळ छे तेने जाणनारा नयथी जाणेल ‘जीवा–जीवौ’ जीव, अजीव ‘च’ वळी ‘पुण्यपापं’ पुण्य अने पाप ‘च’ तथा ‘आस्रवसंवरनिर्जराः’ आस्रव, संवर, निर्जरा, ‘बन्धः’ बंध ‘च’ अने ‘मोक्षः’ मोक्ष ‘सम्यक्त्वम्’–ए नवतत्त्व सम्यक्त्व छे. एटले ए नवतत्त्वमांथी एक त्रिकाळीने जुदो तारवीने ए जाणनार, जाणनार जाणनारमात्र एकने ज द्रष्टिमां लेवो एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. एने आत्मा छे तेवो बराबर मान्यो, जाण्यो अने अनुभव्यो कहेवाय.
भाई! आ तो अभ्यास होय तो समजाय एवुं छे. मेट्रिक, बी. ए., एल. एल. बी. वगेरे अभ्यासमां केटलोय वखत गाळे. संस्कृतना अभ्यासमां वरसो गाळे पण ए कांई काम आवे नहीं. अहीं तो आत्मा ज्ञायकपणे जे त्रिकाळ छे तेना संस्कार नाखवा, अनुभव करवो ए अभ्यास सार्थक छे.
आ जीवादि नवतत्त्वो-जीव, अजीव, पुण्य, पाप आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा अने मोक्ष छे. तेमां जीव अने अजीव बे पदार्थ छे. जीव छे, शरीर, कर्म आदि अजीव छे, कर्मना निमित्तना संबंधमां पुण्य-पाप अने आस्रव अने बंध थाय छे तथा संवर,