निर्जरा अने मोक्ष निमित्तना (कर्मना) अभावमां थाय छे. पण आ नवे तत्त्वोमां निमित्तनी अपेक्षा आवे छे. ते अपेक्षा छोडी दईने एकलो ज्ञायक, ज्ञायकभाव जे पूर्णज्ञानघन छे एनी द्रष्टि करवी, एनो स्वीकार करवो, सत्कार करवो एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. आ सिवाय देव-शास्त्र-गुरुने मानवा के नवतत्त्वने भेदथी मानवा ते कांई सम्यग्दर्शन नथी. आ सम्यक् अनेकांत छे.
अने चारित्र? आत्मा अतीन्द्रिय आनंदमूर्ति छे. एनुं भान थईने एमां विशेष विशेष लीनता-रमणता थतां जे प्रचुर आनंदनुं वेदन थाय ते चारित्रदशा छे. प्रथम जेने सम्यग्दर्शन होय तेने विशेष स्थिरता थाय ते चारित्र छे. सम्यग्दर्शन न होय अने पाधरा (सीधा) व्रत लईने बेसी जाय ए तो बधां एकडा विनानां मींडां छे. ए बधुं मिथ्यात्वनी भूमिका छे.
आ जीवादि नवतत्त्वो भूतार्थनयथी जाण्ये सम्यग्दर्शन ज छे -ए नियम छे. जे नवतत्त्वो छे तेमां त्रणलोकना नाथ भगवान आत्मा चैतन्यहीरलो बिराजमान छे. जेम हीराने अनेक पासा छे तेम आ चैतन्यहीरलाने गुणरूप अनंत पासा छे. ए अनंत पासा (गुण) स्वयं परिपूर्ण छे तथा वस्तुमां अभेद एकरूप पडेला छे. आवी अनंतगुणमंडित अभेद एकरूप वस्तु जे चैतन्यघनस्वरूप आत्मा तेने भूतार्थनय वडे जाणवी ते नियमथी सम्यग्दर्शन छे. अहीं शुद्धनयने भूतार्थनय कह्यो छे. अथवा त्रिकाळी वस्तु ए ज शुद्धनय छे. आ वात ११मी गाथामां आवी गई छे.
अहाहा...! जेने जाण्ये अनंत जन्म-मरणनो अंत आवी जाय, पूर्ण अनंत अतीन्द्रिय-आनंदनी प्राप्ति थाय एटले मुक्ति थाय ए कारण केवुं होय? बापु! (ए साधारण न होय.) ए तो पूर्ण स्वरूप छे जेमां न राग छे, न भेद छे, न पर्यायनो प्रवेश छे. एवी झळहळ चैतन्यज्योतिस्वरूप अभेद एकरूप ज्ञायक वस्तुमां द्रष्टि करवी ते सम्यग्दर्शन छे, ते निश्चय छे. आ तो मुद्रानी मूळ रकमनी वात छे.
घराकनो हिसाब करे त्यारे कहे-रकमनुं व्याज तो आप्युं, पण मूळ रकम? मूळ रकम तो लाव. एम अनादिनी पुण्यनी क्रिया करीकरीने मरी गयो, पण मूळ रकम शुं छे ए तो जो. मूळ मुदनी रकम तो चैतन्यज्योत पूर्णज्ञानघन नवतत्त्वमां पर्यायपणे परिणमेली देखावा छतां जे ज्ञायकपणे एकरूप छे ते छे. एने जाण्ये, मान्ये सम्यक् कहेतां सत्यदर्शन छे. जेवुं एनुं पूर्ण सत् स्वरूप छे तेवी ज तेनी प्रतीति थवी तेने सत्यदर्शन कहे छे.भाई! धर्मनी शरूआत अहींथी थाय छे. एना विना लाखो- करोडोनां दान करे, मंदिरो बनावे के उपवास करीने मरी जाय तोपण ए बधुं थोथेथोथां छे. तो शुं ए बधुं