Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १९३

न करवुं? कोण करे? मंदिरादि बधुं एना कारणे थाय छे. (शुभभावने कारणे नहीं) पण ए शुभभाव आवे छे, ए होय छे, बस एटलुं ज. तथापि ए शुभभाव ते धर्म नथी; ए तो संसार छे, रखडवानो भाव छे. पुण्य पोते रखडाउ छे, एनाथी रखडवुं केम मटे? ए पुण्यभाव-शुभभाव संसार छे.

जेनुं स्वरूप केवळी पण पूरुं कही शक्या नहीं एवो तुं कोण अने केवडो छुं? भाई, आ वाणी तो जड छे ए चैतन्यनुं स्वरूप केटलुं कहे? ए अरूपी चैतन्यघन भगवान वाणीमां केटलो आवे? ईशारा आवे, भाई! अहीं पूर्णज्ञानघन शब्द वापरीने आचार्ये एक गुण पूर्ण छे अने एवा अनंतगुणनो एकरूप पूर्णज्ञानघन प्रभु आत्मा छे एम दर्शाव्युं छे. एने ज्ञानमां लईने-वर्तमान ज्ञाननी पर्यायमां ज्ञेय बनावीने प्रतीति करवी ए सम्यग्दर्शन छे. ए धर्मनुं मूळ छे. जेम मूळ विना, डाळी ने पांदडां, फळ आदि होतां नथी तेम सम्यग्दर्शनरूप मूळ विना चारित्र के व्रत, तप होता नथी.

अहाहा...! जीवादि नवतत्त्वो भूतार्थनयथी जाण्ये सम्यग्दर्शन ज छे ए नियम कह्यो. वस्तुस्थितिनो आ नियम छे. हवे तेनुं कारण समजावतां कहे छे-तीर्थनी व्यवहारधर्मनी प्रवृत्ति अर्थे अभूतार्थनयथी जीव-अजीव आदि नवतत्त्वो कहेवामां आवे छे. ते आ प्रमाणेः जीव-एक समयनी जीवनी पर्याय ते अहीं जीव कहे छे; अजीव-अजीवनुं जे ज्ञान थाय छे तेने अहीं अजीव कहे छे; पुण्य-दया, दान, व्रत, पूजा, भक्ति आदिनो भाव ते पुण्यभाव छे; पाप-हिंसा, जूठ, चोरी, कुशील, भोग आदि भाव, आ रळवा-कमावानो, दुकान चलाववानो, दवा-ईन्जेकशन देवानो भाव, ते पापभाव छे; ए पुण्य अने पाप बन्ने भाव ते आस्रव छे. आ एटले मर्यादाथी अने स्रववुं एटले आववुं. मर्यादाथी कर्मनुं आववुं ते आस्रव छे. जेम वहाणमां छिद्र होय तो एने लईने पाणी अंदर आवे तेम आत्मामां पुण्य-पापना भाव थाय तो एना संबंधमां नवां (कर्मनां) आवरण आवे ते आस्रव छे; संवर-आत्मा शुद्धस्वरूपे पूर्ण छे; पूर्ण शुद्धना आश्रये शुद्धिनो अंश प्रगटे ते संवर छे; निर्जरा -संवरपूर्वक अशुद्धतानुं खरवुं, कर्मनुं गळवुं अने शुद्धतानुं वधवुं ए त्रणेय निर्जरा छे; बंध-दया दान आदि जे विकल्प ऊठे तेमां अटकवुं ते बंध छे; मोक्ष वस्तु ज्ञायकस्वरूप अबंध छे. तेमां पूर्ण स्थिरता थतां पूर्ण निर्मळ दशा, पूर्ण शुद्धता, पूर्ण वीतरागता प्रगट थवी एनुं नाम मोक्ष छे. जेवुं पूर्णानंद स्वरूप छे तेवो पूर्ण आनंद प्रगट थई जवो ते मोक्ष छे.

कोईने एम थाय के आ बधुं शुं छे? नवुं नथी, बापु! तने नवुं लागे छे. केमके तारी चीज एकरूप शुं अने ए चीजनी आ दशाओ शुं ए कोई दिवस तें