सांभळ्युं नथी. आ छे तो घरनी वात, पण एणे परघरनी ज आजसुधी मांडी छे. संसारनी वातोमां जाणे डाह्यानो (चतुरनो) दीकरो! पण अरेरे! खेद छे के तुं कोण छुं अने केवडो छुं एनी खबर नथी.
हवे कहे छे- आ नवतत्त्वनी जे भेदरूप दशाओ तेमनामां एकपणुं प्रगट करनार भूतार्थनयथी एकपणुं प्राप्त करीने शुद्धनयपणे स्थपायेला आत्मानी अनुभूति -के जेनुं लक्षण आत्मख्याति छे-तेनी प्राप्ति होय छे. ल्यो, जुओ. नवतत्त्वरूप भेदोना विकल्पमां रागनी आडमां जे त्रिकाळी एकरूप आत्मज्योति ढंकाएली छे तेने भूतार्थनय वडे एकपणे प्रगट करवामां आवतां, तेमां एकमां द्रष्टि करीने आत्मप्रसिद्धि जेनुं लक्षण छे ते आत्मानुभूति प्रगट थई जाय छे. नवतत्त्वमां आत्मा प्रसिद्ध न हतो, द्रव्य जे ज्ञायक शाश्वत चैतन्यमूर्ति छे अने पर्याय सहित जोतां प्रसिद्ध नहोतो थतो ते एकरूप चैतन्यने जोतां चैतन्यनो प्रकाश आत्मख्याति प्रसिद्ध थाय छे; प्राप्त थाय छे.
नवना भेदने जोतां नव भेद छे खरा. (पहेलां कहेवाई गयुं के तीर्थनी प्रवृत्ति अर्थे ते भेदो व्यवहारथी कहेला छे) पण ए आश्रय करवा लायक नथी, केमके नवतत्त्वना भेदना ज्ञानमां रोकावाथी रागनी उत्पत्तिनी प्रसिद्धि थाय छे, अनात्मानी प्रसिद्धि थाय छे. परंतु आ नव भेदोमां भूतार्थनय एकपणुं प्रगट करे छे, एकला ज्ञायकभावने देखाडे छे. आ एक त्रिकाळी ज्ञायकभावनी सन्मुख थईने जाणवाथी एकपणुं प्राप्त थाय छे, आनंदनी अनुभूति द्वारा आत्मा प्रसिद्ध थाय छे. (तेथी भूतार्थनयथी नवतत्त्वने जाणवाथी सम्यग्दर्शन ज छे ए नियम कह्यो छे.)
हवे नवतत्त्व उपस्थित केम थयां ते कहे छे. त्यां विकारी थवा योग्य अने विकार करनार-ए बन्ने पुण्य छे, तेम ज ए बन्ने पाप छे. विकारी थवा योग्य एटले जीवनी पर्यायमां विकार थवा योग्य छे. पर्यायमां विकार थवा योग्य जीवनी दशा छे. अने विकार करनार एटले अहीं कर्म जे निमित्त छे एने विकार करनार छे एम कह्युं छे. विकार थवा योग्य पर्याय तो पोताना उपादानथी थई छे, उपादानपणे करनार पोते छे; एमां कर्मनुं निमित्त छे. विकारी थवा योग्य एम कहीने जीवनी पर्यायनी लायकात बतावी छे, द्रव्यस्वभाव तो एवो नथी वर्तमान पर्याय ते विकार थवा योग्य अने एमां कर्म निमित्त ते विकार करनार ए बन्ने पुण्य छे. विकारी थवा योग्य छे ते भावपुण्य अने कर्मनुं जे निमित्त छे ते द्रव्य-पुण्य-एम बन्ने पुण्य छे. ए ज प्रमाणे विकारी थवा योग्य जे जीवनी पर्याय ते भावपाप अने कर्मनुं जे निमित्त ते द्रव्यपाप-एम बन्ने पाप छे. द्रव्यपापए, भावपाप थवामां निमित्त छे. वस्तुस्वभाव पोते पुण्य-पापने करनार नथी. शुभभाव