थवा लायक जीव (पर्याय) अने एनो करनार कर्मनो उदय ते अजीव छे तेने द्रव्यपुण्य कहीए. एवी रीते हिंसा जूठ, चोरी आदि भावपाप थवा लायक तो जीव छे, पर्यायमां एवी लायकात छे अने कर्मनुं जे निमित्त छे तेने द्रव्यपाप कहीए.
मोहकर्मनो जे उदय छे ए तो पाप ज छे. घातीकर्मनो उदय जे छे एतो एकलो पापरूप ज छे. छतां अहीं पुण्यभावपणे परिणम्यो छे तेने भावपुण्य जीव कह्यो अने कर्मनो उदय (घातीकर्मनो) जे अजीव छे तेने द्रव्य-पुण्य कह्यो. शातानो उदय छे ए पुण्यभावमां निमित्त न थाय. ए तो अघाती छे. एनो उदय तो संयोग आपे. (अघाती कर्म संयोगमां निमित्त थाय, पुण्य-पापमां निमित्त न थाय) पण घातीकर्मनो उदय जे छे एने अहीं भावपुण्यनी अपेक्षाए द्रव्यपुण्य कह्यो छे. घातीकर्मनो उदय मंद होय के तीव्र, ए छे तो पाप ज. कर्मनो उदय भले तीव्र होय, अहीं रागनी मंदतारूप पुण्यभाव करे तो कर्मना उदयने द्रव्य-पुण्य (मंद उदय) कहेवाय छे. कर्मनो उदय मंद छे माटे अहीं शुभभाव थयो एम नथी. अहीं एम नथी लीधुं के शुभभावनो उदय होय तो द्रव्य-पुण्य. जीवना पुण्यभावने जे निमित्त छे एने द्रव्य-पुण्य कह्युं छे. जीव पोताना शुभभावने लायक छे ते जीव-पुण्य-भावपुण्य अने एमां जे कर्म निमित्त छे ते द्रव्य-पुण्य, अजीव-पुण्य कह्युं छे. (अजीव पुण्य जीवना पुण्यभावमां निमित्त छे, ते पुण्यभाव करावतुं नथी.)
चाहे एकेन्द्रियमां हो के पंचेन्द्रियनी पर्यायमां भगवान आत्मा जे द्रव्यस्वभाव छे ए तो एकलो शुद्ध त्रिकाळ छे. अने ए ज्ञायक ज उपादेय छे. हवे अहीं कहे छे के द्रव्य त्रिकाळ शुद्ध होवा छतां एनी पर्यायमां पुण्य, पाप, आस्रव अने बंध एवो बे भाग ऊभा केम थाय छे? वस्तु एक अने नव भेद जे हेय छे ते ऊभा केम थाय छे?
आत्मवस्तु द्रव्यस्वभावथी शुद्ध चैतन्यरूप आनंदघन छे. ते एकने नव न होई शके. पण जेने ए द्रष्टिमां आव्यो नथी, अनुभवमां आव्यो नथी एने पर्यायमां विकार छे. पर्यायमां बीजानो संग-संबंध थवाथी तेने नव ऊभा थाय छे. द्रव्यमां तो कोई एवी शक्ति (गुण) नथी जे विकार करे. जो गुण एवो होय तो विकार टळे नहीं. त्यारे कोई कहे के पर्यायमां विकार थाय छे ने? समाधान एम छे के पर्यायबुद्धिवाळाने पर्यायनी योग्यताथी थाय छे, द्रव्यबुद्धिवाळाने नहीं. द्रव्यबुद्धिवाळाने एनो निषेध थई गयो छे, एतो ज्ञाता थई गयो छे. बापु! जरा धीरजथी समजवुं जोईए; आ तो सर्वज्ञ वीतराग परमेश्वरनो अलौकिक मार्ग छे. एनो व्यवहार पण अलौकिक रीते छे. अत्यारे आ व्यवहार सिद्ध कर्यो छे. व्यवहारनयथी ए (नवतत्त्वो) भूतार्थ छे, पण ए आश्रय करवा लायक नथी; केमके एना आश्रये समकित थतुं नथी.