समयसार गाथा-२०३ ] [ १६७ शुं उत्तर हतो? ‘के शुद्धनय आत्मानुं शुद्ध पूर्ण स्वरूप जणावतो होवाथी शुद्धनय द्वारा पूर्णरूप केवळज्ञाननो परोक्ष स्वाद आवे छे.’
शुं कह्युं? के सम्यग्ज्ञाननो अंश जे शुद्धनय ते आत्मानुं शुद्ध पूर्णस्वरूप बतावे छे. एटला माटे शुद्धनय द्वारा पूर्णरूप केवळज्ञाननो परोक्ष स्वाद आवे छे; परोक्ष स्वाद आवे छे केमके हजी केवळज्ञाननी पर्याय प्रगट थई नथी. परंतु केवळज्ञाननी पर्याय केवी छे ते प्रतीतिमां आवी गयुं छे, माटे केवळज्ञाननो परोक्ष स्वाद आवे छे. शास्त्रमां (धवलमां) एवो पाठ आवे छे के मति-श्रुतज्ञान केवळज्ञानने बोलावे छे. जेम रस्ते चालनारने कोई बीजो बोलावे के-अहीं आवो, अहीं आवो-एम मति-श्रुतज्ञान के जेनी साथे निराकुल आनंदनो स्वाद भेगो छे ते केवळज्ञानने बोलावे छे. दिगंबरनुं जूनुं-पुराणुं शास्त्र षट्खंडागम छे तेमां आ वात लीधी छे. एनो अर्थ शुं? के मतिज्ञानमां ज्यां आत्मानो स्वाद आव्यो तो ते मतिज्ञाननो पूर्ण स्वाद केवळज्ञानना पूर्ण स्वादने बोलावे छे अर्थात् केवळज्ञानना पूर्ण स्वादनुं एमां भान थई गयुं छे. केवळज्ञाननो एमां प्रत्यक्ष स्वाद नथी पण एना स्वादनी प्रतीति थई गई छे; अने ते मति-श्रुतनो स्वाद वधतो वधतो स्वरूपस्थिरतानी पूर्णता द्वारा केवळज्ञानना स्वादने प्राप्त थई जशे. कोईने आमां एकान्त लागे पण आ सम्यक् एकान्त छे भाई! बापु! तुं परने-जडने परखवामां रोकाई गयो छो पण आ चैतन्यहीरलाने परख्या विना भवना निवेडा नहि आवे हों.
जुओ, एक मोटो झवेरी हतो. हीरा-माणेकनो महा पारखु. एक दिवस राजा पासे थोडा हीरा आव्या तो नगरना हीरा-पारखु झवेरीओने बोलाव्या. आ मोटो झवेरी पण गयो. तेणे हीरानी बराबर परीक्षा करीने कह्युं के-हीराना पासामां जरी डाघ छे, नहितर तो आ हीरा अबजो रूपियानी किंमतना थाय. राजा तेना पर खुश थयो अने कह्युं, जाओ, तमने बक्षीश आपीए छीए. त्यां विलक्षण दिवाने वच्चे पडीने कह्युं-आजे नहि, काले वात.
पछी मोडे दिवान पेला झवेरीना घेर गया अने झवेरीने पूछयुं-वाह! तमे महान हीरा-पारखु छो पण अंदर घटमां चैतन्य हीरो शोभी रह्यो छे तेनी परख करी के नहि? झवेरी कहे-चैतन्यहीरो वळी केवो? एनी तो मने खबर ज नथी.
बीजे दिवसे ओलो झवेरी बक्षीस लेवा राजदरबारमां गयो. राजा कहे-बक्षीस आपो. त्यारे दिवान कहे-तेने सात जुतां मारो. मूरख! तें पोतानी किंमत करी नहि अने जडनी किंमत करवा नीकळ्यो छो? राजा कहे-शुं वात छे? दिवान कहे-राजाजी! हुं झवेरीने घेर गयो हतो अने पूछयुं के अंदर चैतन्यहीरो छे तेनी किंमत शुं? तो कहे छे- चैतन्यहीरो वळी केवो? एनी तो मने खबर नथी. माटे ते मूर्ख