१७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
निष्पीताखिलभावमण्डलरसप्राग्भारमत्ता इव।
यस्माभिन्नरसः स एष भगवानेकोऽप्यनेकीभवन्
वल्गत्युत्कलिकाभिरद्भुतनिधिश्चैतन्यरत्नाकरः ।।
एकनुं आलंबन करवुं. तेना आलंबनथी ज (निज) पदनी प्राप्ति थाय छे, भ्रांतिनो नाश थाय छे, आत्मानो लाभ थाय छे, अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे, (एम थवाथी) कर्म जोरावर थई शकतुं नथी, रागद्वेषमोह उत्पन्न थता नथी, (रागद्वेषमोह विना) फरी कर्म आस्रवतुं नथी, (आस्रव विना) फरी कर्म बंधातुं नथी, पूर्वे बंधायेलुं कर्म भोगवायुं थकुं निर्जरी जाय छे, समस्त कर्मनो अभाव थवाथी साक्षात् मोक्ष थाय छे. (आवुं ज्ञानना आलंबननुं माहात्म्य छे.)
भावार्थः– कर्मना क्षयोपशम अनुसार ज्ञानमां जे भेदो थया छे ते कांई ज्ञानसामान्यने अज्ञानरूप नथी करता, ऊलटा ज्ञानने प्रगट करे छे; माटे भेदोने गौण करी, एक ज्ञानसामान्यनुं आलंबन लई आत्मानुं ध्यान धरवुं; तेनाथी सर्व सिद्धि थाय छे.
हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः- श्लोकार्थः–
जवामां आवेलो जे समस्त पदार्थोना समूहरूपी रस तेनी अतिशयताथी जाणे के मत्त थई गई होय एवी [यस्य इमाः अच्छ–अच्छाः संवेदनव्यक्तयः] जेनी आ निर्मळथी पण निर्मळ संवेदनव्यक्तिओ (-ज्ञानपर्यायो, अनुभवमां आवता ज्ञानना भेदो) [यद् स्वयम् अच्छलन्ति] आपोआप ऊछळे छे, [सः एषः भगवान् अद्भुतनिधिः चैतन्यरत्नाकरः] ते आ भगवान अद्भुत निधिवाळो चैतन्यरत्नाकर, [अभिन्नरसः] ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो साथे जेनो रस अभिन्न छे एवो, [एकः अपि अनेकीभवन्] एक होवा छतां अनेक थतो, [उत्कलिकाभिः] ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो वडे [वल्गति] दोलायमान थाय छे-ऊछळे छे.
भावार्थः– जेम घणां रत्नोवाळो समुद्र एक जळथी ज भरेलो छे अने तेमां नाना मोटा अनेक तरंगो ऊछळे छे ते एक जळरूप ज छे, तेम घणा गुणोनो भंडार आ ज्ञानसमुद्र आत्मा एक ज्ञानजळथी ज भरेलो छे अने कर्मना निमित्तथी ज्ञानना अनेक भेदो-व्यक्तिओ आपोआप प्रगट थाय छे ते व्यक्तिओ एक ज्ञानरूप ज जाणवी, खंडखंडरूपे न अनुभववी. १४१.