समयसार गाथा-२०४ ] [ १७१
किॢश्यन्तां च परे महाव्रततपोभारेण भग्नाश्चिरम्।
साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं संवेद्यमानं स्वयं
ज्ञानं ज्ञानगुणं विना कथमपि प्राप्तुं क्षमन्ते न हि।। १४२।।
श्लोकार्थः– [दुष्करतरैः] कोई जीवो तो अति दुष्कर (महा दुःखे करी शकाय
एवां) अने [मोक्ष–उन्मुखैः] मोक्षथी पराङ्मुख एवां [कर्मभिः] कर्मो वडे [स्वयमेव] स्वयमेव (अर्थात् जिनाज्ञा विना) [क्लिश्यन्तां] कलेश पामे तो पामो [च] अने [परे] बीजा कोई जीवो [महाव्रत–तपः– भारेण] (मोक्षनी संमुख अर्थात् कथंचित् जिनाज्ञामां कहेलां) महाव्रत अने तपना भारथी [चिरम्] घणा वखत सुधी [भग्नाः] भग्न थया थका (-तूटी मरता थका) [क्लिश्यन्तां] कलेश पामे तो पामो; (परंतु) [साक्षात् मोक्षः] जे साक्षात् मोक्षस्वरूप छे, [निरामयपदं] निरामय (रोगादि समस्त कलेश विनानुं) पद छे अने [स्वयं संवेद्यमानं] स्वयं संवेद्यमान छे (अर्थात् पोतानी मेळे पोते वेदवामां आवे छे) एवुं [इदं ज्ञानं] आ ज्ञान तो [ज्ञानगुणं विना] ज्ञानगुण विना [कथम् अपि] कोई पण रीते [प्राप्तुं न हि क्षमन्ते] तेओ प्राप्त करी शक्ता ज नथी.
भावार्थः– ज्ञान छे ते साक्षात् मोक्ष छे; ते ज्ञानथी ज मळे छे, अन्य कोई क्रियाकांडथी तेनी प्राप्ति थती नथी. १४२.
हवे, ‘कर्मना क्षयोपशमना निमित्ते ज्ञानमां भेद होवा छतां तेनुं स्वरूप विचारवामां आवे तो ज्ञान एक ज छे अने ते ज्ञान ज मोक्षनो उपाय छे’ एवा अर्थनी गाथा कहे छेः-
जुओ, एकलुं एकरूप जे ज्ञान ते आत्मस्वभाव छे अने तेमां एकाग्रता ए एक ज मोक्षनो उपाय छे, बाह्य क्रियाकांड कोई उपाय नथी एम कहे छेः-