१७२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
‘आत्मा खरेखर परमार्थ छे अने ते ज्ञान छे.’ शुं कह्युं? आ देहमां जे आत्मा छे ते परमार्थ एटले परम पदार्थ छे, सर्वोत्कृष्ट पदार्थ छे, परमात्मस्वरूप छे. अहीं तेने ज्ञान साथे मेळवीने कहे छे-ते ज्ञान छे. एटले शुं? के आत्मा जाणग-जाणगस्वभावी एवो त्रिकाळ ज्ञानस्वरूप छे. अहाहाहा...! आत्मा जे खरेखर परम पदार्थ छे ते नित्य ज्ञानस्वरूप छे. ज्ञान तेनो त्रिकाळी स्वभाव होवाथी ते ज्ञानस्वरूपी छे.
हवे कहे छे-‘वळी आत्मा एक ज पदार्थ छे; तेथी ज्ञान पण एक ज पद छे.’ जुओ, पहेलां सामान्य वात करी के आत्मा खरेखर परम पदार्थ-महापदार्थ छे अने ते ज्ञान कहेतां ज्ञानस्वरूप छे. हवे विशेष कहे छे के-आत्मा एक ज पदार्थ छे. एटले शुं? के अनंत गुणनो पिंड प्रभु आत्मा एक ज पदार्थ छे, एकस्वरूप ज छे. सूक्ष्म वात छे प्रभु! आत्मा अनेकरूप-भेदरूप थई गयो नथी पण अखंड एकरूप ज छे, एक ज पदार्थ छे. अने तेथी ज्ञान पण एक ज पद छे. जाणग स्वभाव एवुं ज्ञान पण एक ज पद छे अर्थात् अभेद एकरूप ज छे. अहाहाहा...! आत्मा महाप्रभु-महापदार्थ छे. वळी जेम अग्नि उष्णस्वरूप छे तेम आत्मा ज्ञानस्वरूप छे. अग्नि जेम एकस्वरूप छे तेम आत्मा एकरूप ज छे. वळी जेम अग्निनुं उष्णपणुं एक ज छे तेम ज्ञानपद पण एक ज छे, तेमां भेद नथी, त्रिकाळ अभेद छे. जन्म-मरणरहित थवानो वीतरागनो मारग बहु सूक्ष्म बापु!
कहे छे-‘तेथी ज्ञान पण एक ज पद छे.’ अहाहाहा...! आत्मा जेम एक वस्तु छे, एक ज पदार्थ छे तेम ज्ञान पण एक ज पद छे. जेम आत्मा अखंड एकरूप छे तेम तेनो ज्ञानस्वभाव पण अखंड एकरूप छे.
हवे कहे छे-‘जे आ ज्ञान नामनुं एक पद छे ते आ परमार्थस्वरूप साक्षात् मोक्ष-उपाय छे.’
अनंत धर्मोनो पिंड प्रभु आत्मा वस्तु-धर्मी छे; तथा ते एक छे. तेथी तेनो ज्ञानस्वभाव-धर्म पण एकरूप त्रिकाळ छे. हवे जेने धर्म करवो छे तेणे शुं करवुं? तो कहे छे-जे आ ज्ञानस्वभावमय एक पद छे ते आ परमार्थस्वरूप साक्षात् मोक्षनो उपाय छे. एटले शुं? एटले के जे एक ज्ञानस्वभाव वस्तु छे तेमां एकाग्रता करवी ते मोक्षनो उपाय छे. आवो मार्ग छे! लोकोने अभ्यास नहि अने ए तरफनी रुचि नहि एटले आकरो लागे, पण शुं थाय? आकरो लागे एटले आ (व्रत, तप आदि) बीजो मार्ग छे एम माने पण बापु! मार्ग तो आ एक ज छे. अरे! तुं जो तो