Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०४ ] [ १७३ खरो के रागनी, भेदनी ने निमित्तनी द्रष्टिने आधीन थईने भगवान! तुं ८४ ना चक्करमां रखडी रह्यो छे!

अहा! भगवान आत्मा चैतन्यमहाप्रभु सदा ज्ञानस्वभावी वस्तु एक छे. अने तेनुं ज्ञानपद-भगवान ज्ञानस्वभाव-पण त्रिकाळ अखंड एकरूप छे. हवे कहे छे आ जे एक-अभेद ज्ञानस्वभाव छे अर्थात् एकला ज्ञानरसथी भरेलो ज्ञायकभाव छे तेमां एकाग्रता करवी, तेमां तद्रुप थई प्रवर्तवुं-ते साक्षात् मोक्ष नाम पूर्ण सुखनी प्राप्तिनो उपाय छे. समजाणुं कांई...? आ पैसा-बैसा आदिमां सुख नथी एम कहे छे. पैसा आदि तो भाई! धूळ-माटी छे; एमां सुख कयां छे? बहारमां कयांय-धूळमांय-सुख नथी. अहीं तो आ दया, दान आदि पुण्यभाव थाय एमांय सुख नथी अने भेदना विकल्पमांय सुख नथी एम कहे छे; गजब वात छे भाई!

कहे छे-तुं पण भगवान छो; भग नाम ज्ञान अने आनंदनी लक्ष्मीथी परिपूर्ण भरेलो एवो तुं भगवान आत्मा छो. छतां तने जाणे बीडी पीवे त्यारे होश-मस्ती- आनंद आवे छे एम तने थई जाय छे! अरे प्रभु! शुं थयुं छे तने आ? भाई! बीडी तो जड छे; एमां कयां आनंद छे? अने तेना तरफनुं लक्ष जे छे ए तो राग छे. ए रागनो स्वाद-झेरनो स्वाद तने आवे अने तुं आनंद माने छे? सर्वज्ञ परमेश्वरे तो आ कह्युं छे के पूर्ण आनंदनो नाथ तो पूर्ण ज्ञानस्वरूप-एकला ज्ञाननो पिंड प्रभु तुं आत्मा छो; अने तेमां एकाग्र थई प्रवर्ते ते मोक्षनो-परम सुखनो उपाय छे.

अहा! अंदर भगवान आत्मा वस्तु छे के नहि? पदार्थ छे के नहि? (छे); पदार्थ छे तो ते एक छे के अनेक? वस्तु तरीके ते एक अभेद पदार्थ ज छे. तेथी तेनो ज्ञानस्वभाव पण एक ज पद छे. ज्ञान-ज्ञान-ज्ञान एवो त्रिकाळ एकरूप ज्ञानस्वभाव छे. अहीं कहे छे-आ ज्ञानस्वभावनी सन्मुख थईने तेमां एकाग्र थवुं ते मोक्षनो उपाय छे अर्थात् तेमां सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र त्रणे आवी जाय छे. ज्ञानस्वभावनी अंतर- एकाग्रता करतां जे निर्विकल्प अनुभव थयो तेमां-आत्मानी प्रतीति थई ते सम्यग्दर्शन छे, ज्ञाननुं ज्ञान थयुं ते सम्यग्ज्ञान छे अने ज्ञाननी ज्ञानमां ज रमणता थई ते सम्यक् चारित्र छे अने आ धर्म छे, अर्थात् मोक्षनो उपाय छे. आखो दि’ पैसा रळवामां अने स्त्री-पुत्र-परिवारने साचववामां गुंचायेलो रहे तेने आवुं कठण पडे. परंतु भाई! आ समज्या विना तारा भवना निवेडा नहि आवे. वीतराग सर्वज्ञ परमात्माए धर्मसभामां (समवशरणमां) आ ज मार्ग कह्यो छे अने ते ज अहीं कुंदकुंदादि मुनिवरो जगतने जाहेर करे छे.

भाई! तुं अनादिथी रागमां एकाग्र छे. पण रागमां एकाग्रता ए दुःखनो अर्थात् चार गतिना परिभ्रमणना कलेशनो रस्तो छे. ए पारावार कलेश-दुःखथी छूटी