Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ सुख केम थाय, आत्मलाभ वा परम आनंदनी प्राप्ति केम थाय तेनो उपाय अहीं संतो बतावे छे. कहे छे-भगवान! तुं अतीन्द्रिय महापदार्थ छे अने वस्तुपणे एक ज छे, अभेद छे. वळी तुं ज्ञानस्वरूप छे अने तारो ज्ञानस्वभाव अभेद एक ज छे. आवो एक सामान्य जे ज्ञानस्वभाव तेमां एकाग्र थई अंतर्लीन थवुं ते मोक्षनो एटले परम आनंदनी प्राप्तिनो उपाय छे. अहाहाहा...! ज्ञान ज्ञानमां ज एकाग्र थई तेमां ज रमणता करे ते दुःखथी छूटवानो उपाय छे.

हवे कहे छे-‘अहीं, मतिज्ञान आदि (ज्ञानना) भेदो आ एक पदने भेदता नथी परंतु तेओ पण आ ज एक पदने अभिनंदे छे.’

शुं कह्युं आ? के आत्मानो ज्ञानस्वभाव सामान्य-सामान्य त्रिकाळ एकरूप छे. तेमां एकाग्रता थतां शुद्धताना-मतिश्रुतज्ञान आदिना अनेक पर्यायो प्रगटे छे; परंतु जे अनेक पर्यायो प्रगटे छे तेओ, आ एक ज्ञानपदने भेदता नथी, पण एक ज्ञानसामान्यने ज अभिनंदे छे अर्थात् तेओ ज्ञानस्वभावना एकपणानी ज पुष्टि करे छे. जे मति- श्रुतज्ञान आदि भेदो प्रगटया ते बधा सामान्यमां अभेद थाय छे; तेथी अनेकपणुं त्यां रहेतुं नथी.

अहा! भगवान आत्मा सदा आनंदस्वरूप छे. परंतु अहीं तो ज्ञानथी लेवुं छे ने? केमके ज्ञाननो अंश प्रगट छे. आनंद प्रगट नथी, तो ते वडे ज्ञानमां-ज्ञान के जे एक पद छे तेमां-एकाग्र थाय तो आनंद प्रगटे. अहीं कहे छे-ज्ञानमां एकाग्र थतां जे मतिज्ञान आदि शुद्धताना भेदो प्रगटे छे ते बधा ज्ञानपदने भेदता नथी, खरेखर तो तेओ सामान्य एक ज्ञानस्वभावमां ज अभेदपणाने पामे छे. भाई! आ अखंड एकरूप जे ज्ञायकभाव तेनी परिणतिना जे भेदो छे ते ज्ञायकने भेदता नथी परंतु तेओ आ ज एक पदने अभिनंदे छे, टेको आपे छे. -शुं कह्युं? वस्तु-भगवान आत्मा-त्रिकाळ एकस्वरूपे छे; अने तेनुं ज्ञान-त्रिकाळी ज्ञानस्वभाव-पण अभेद एकस्वरूपे छे. हवे एमां एकाग्रताथी शुद्धताना जे अनेक भेदो उत्पन्न थाय छे तेओ ज्ञानसामान्यने भेदता नथी पण सामान्यनी ज पुष्टि करे छे; पुष्टि करे छे एटले शुं? के अभेदमां ज ते भेदो एकाग्र छे. भले विशेष (पर्यायनी शुद्धता) वधे, तो पण ए छे अभेदनी एकाग्रतामां. ए भेदो अभेदने भेदरूप करता नथी पण अभेदमां एकाग्र तेओ एक अभेदने ज अभिनंदे छे, प्रसिद्ध करे छे. आवी वात! अहो! अनंतकाळथी दुःखना पंथे दोराई गयेला जीवोने आ सुखनो पंथ आचार्य भगवान बतावे छे.

अहीं शुं कहे छे? के सामान्य अभेद एक ज्ञायकभावमात्र सच्चिदानंद प्रभु आत्मा छे. त्यां एक ज्ञायकभावमां एकाग्रता थतां मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान-एम ज्ञाननी निर्मळ-निर्मळ पर्यायो अनेकपणे थाय छे.