समयसार गाथा-२०४ ] [ १७प छतां ते बधी एक ज्ञानसामान्यमां ज एकाग्र छे, लीन छे. अर्थात् त्यां बधुं अभेदपणे ज भासे छे, भेद भासतो नथी. अहा! अनेकपणे थयेली ते पर्यायो एक ज्ञानसामान्यने ज अभिनंदे छे, पुष्ट करे छे, समर्थन आपे छे. आवो मारग! दुनियाथी साव जुदो; अभ्यास नहि एटले सूक्ष्म लागे अने एटले बिचारा लोकोने एम थाय के अमे आ व्रत, तप, भक्ति करीए छीए ने? एम के एनाथी धर्म थशे. पण व्रत, तप आदि भाव तो राग छे, ते कांई आत्मानो धर्म नथी. आत्मानो धर्म तो त्रिकाळी ज्ञानस्वभावमां एकाग्र थवाथी प्रगट थाय छे. गाथा ९६ मां न आव्युं के-अमृतनो सागर प्रभु आत्मा मृतक कलेवरमां मूर्च्छायो छे. भाई! आ देह तो मृतक कलेवर अर्थात् मडदुं छे अने अंदरमां जे शुभाशुभ राग थाय छे ते पण जड, अचेतन मडदुं ज छे, केमके तेमां चैतन्यनो अंश नथी.
अ... हा... हा... हा...! कहे छे-ज्ञानना भेदो आ एक पदने भेदता नथी पण तेओ आ ज एक पदने अभिनंदे छे, पुष्टि आपे छे. आ वात हवे द्रष्टांतथी समजाववामां आवे छेः-
‘जेवी रीते आ जगतमां वादळांना पटलथी ढंकायेलो सूर्य के जे वादळांना विघटन अनुसारे प्रगटपणुं पामे छे, तेना प्रकाशननी हीनाधिकतारूप भेदो तेना प्रकाशस्वभावने भेदता नथी,...
जुओ, वादळांना पटलथी एटले गाढ वादळोथी ढंकायेलो सूर्य वादळांना विघटन अनुसारे प्रगटपणुं पामे छे. विघटन एटले विखराई जवुं. जेटलां जेटलां वादळो विखराई जाय छे तेटलो तेटलो सूर्य प्रगट थाय छे अर्थात् तेटलो सूर्य प्रकाशपणाने पामे छे. त्यां सूर्यना प्रकाशनना हीनाधिकतारूप भेदो जे प्रगट थया ते भेदो तेना प्रकाशस्वभावने भेदता नथी, खंडित करता नथी पण तेना प्रकाशस्वभावनुं एकपणुं प्रगट करे छे. थोडुं प्रकाशपणुं, विशेष प्रकाशपणुं-एवा प्रकाशना भेदो सूर्यना सामान्य प्रकाशस्वभावने भेदता नथी पण तेनुं एकपणुं प्रसिद्ध करे छे. आ द्रष्टांत थयुं. हवे कहे छे-
‘तेवी रीते कर्मपटलना उदयथी ढंकायेलो आत्मा के जे कर्मना विघटन (क्षयोपशम) अनुसारे प्रगटपणुं पामे छे, तेना ज्ञाननी हीनाधिकतारूप भेदो तेना (सामान्य) ज्ञानस्वभावने भेदता नथी परंतु उलटा तेने अभिनंदे छे.’
जुओ, आत्मा ढंकायेलो छे तो पोते पोतानी योग्यताथी, कांई कर्मना उदयथी ढंकाई गयो छे एम नथी. तो ‘कर्मपटलना उदयथी ढंकायेलो आत्मा’-एम तो चोख्खुं लख्युं छे? हा, पण ए तो निमित्तनी मुख्यताथी व्यवहारनुं कथन छे.
प्रश्नः– आवी भाषा सीधी छे छतां तमे अर्थने फेरवी नाखो छो?