१७६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
समाधानः– भगवान! कर्म तो जड अचेतन छे. ते चैतन्यमय आत्माने शी रीते ढांके? परंतु ज्यारे जीवनी पर्यायमां हीणी अवस्था थवारूप योग्यता होय त्यारे जडकर्मनो उदय तेमां निमित्त होय छे. बस आटलुं. जड कर्म हीन अवस्थापणे जीवने करी दे छे एम छे नहि. भाई! आ तो समजाय एवी रीते सीधो दाखलो आप्यो छे के कर्मना विघटन (क्षयोपशम) अनुसारे ज्ञान प्रगटपणुं पामे छे. त्यां अज्ञानी कहे छे-
जुओ! कर्म जेम घटतुं जाय छे, खसतुं जाय छे तेम ज्ञान प्रगट थतुं जाय छे. छे के नहि?
भाई! एनो एवो अर्थ नथी बापा! भाई! तेनो अर्थ तो ए छे के तेनुं भाव आवरण जे हीणीदशारूप छे ते जेम टळतुं जाय छे ते अनुसारे ज्ञान प्रगटपणुं पामे छे अने तेमां जडकर्मनो क्षयोपशम निमित्त छे. समजाणुं कांई...?
चैतन्यना प्रकाशना नूरनुं पुर प्रभु आत्मा छे. तेने आवरणना क्षयोपशमथी ने पोतानी दशाना क्षयोपशमनी लायकातथी ज्ञान प्रगट थाय छे. अहीं कहे छे-ते ज्ञाननी हीनाधिकताना भेदो, तेना सामान्य ज्ञानस्वभावने भेदता नथी; परंतु उलटा तेने अभिनंदे छे, अर्थात् एकरूप ज्ञानस्वभावने पुष्ट करे छे. अहाहाहा...! ज्ञानना ते भेदो सामान्य-सामान्य ज्ञानमां एकपणाने पामे छे, सामान्यपणाने पामे छे. ते भेदो छे तो पर्याय, (सामान्य नथी) पण त्रिकाळी एक ज्ञानमां एकाग्र थयेला तेओ ज्ञानमां एकपणाने पामे छे, विशेष-विशेष निर्मळताना भेदो स्वभावनी एकताने पामे छे. आवी वात छे!
हवे कहे छे-‘माटे जेमां समस्त भेद दूर थया छे एवा आत्मस्वभावभूत ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं.’
जुओ, शुं कहे छे? के ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं. देव-गुरु-शास्त्रनुं आलंबन करवुं एम नहि, केमके एथी तो राग ज थाय छे. वळी पर्यायना आलंबनथी पण राग-विकल्प ज ऊठे छे. माटे कहे छे-आत्मस्वभावभूत ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन लेवुं. भाई! तुं आ बधां हाडकां ने चामडांना प्रेममां अने पुण्य-पापरूप रागना प्रेममां भ्रष्ट थईने चार गतिमां रखडी मर्यो छो. तारा दुःखनी शुं कथा कहीए? अहीं आ तारा हितनो मारग छे नाथ! भाई! तारो ज्ञानस्वभाव अचिंत्य अलौकिक छे. तो एकवार तारो जे ज्ञानस्वभाव छे तेनुं पोसाण कर ने! तेनो प्रेम कर ने! तारी रुचिने त्यां लई जा ने! भाई! तने अभूतपूर्व अलौकिक आनंद थशे.
कहे छे-आत्मस्वभावभूत ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं. गजब भाषा छे! आत्मा स्वभाववान छे अने ज्ञान तेनो स्वभाव छे. आ आत्मस्वभावभूत ज्ञान त्रिकाळ